15. नीति- न्याय- आगम

 *नीति-न्याय-आगम*

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*?- गुना सीमंधर जिनालय का किसी एक व्यक्ति द्वारा किसी क्षेत्र को समर्पित कर देना क्या उचित है?*

= किसी एक व्यक्ति या परिवार द्वारा निर्माण या संचालन हो रहा है तो उचित था परन्तु इस मन्दिर की कार्य कारिणी समिति है। गुना एवं अन्य स्थानों का योगदान उसके निर्माण में लगा है और उस सब का दान मन्दिर को कर दिया था फिर ऐसी स्थिति में एक व्यक्ति या परिवार अकेले ऐसा निर्णय लेने में सक्षम नहीं है ना न्यायोचित। इससे अन्य मन्दिरों और समाज में अराजकता आ सकती है।


*?- विधिवत् निर्मित मन्दिर एवं प्रतिष्ठित मूर्ति की पुनः प्रतिष्ठा कब होती है?*

=जब मन्दिर या मूर्ति क्षतिग्रस्त हो। गुना सीमंधर जिनालय एवं लगभग 50 मूर्तियां पूर्ण सुरक्षित हैं। फिर प्रशस्ति मिटाकर पुनः प्रतिष्ठा का औचित्य नहीं है। ना ऐसी परम्परा है ना आगम उल्लेख। इससे भी समाज में अराजकता उत्पन्न होगी।


*? गुना की मूर्ति किसी मुनि द्वारा सूरिमंत्रित नहीं हैं इसलिए वे पूज्यनीय नहीं हैं?*

= पंचकल्याणक विधि में प्रतिष्ठाचार्य सूरिमंत्र देने के लिए अधिकृत हैं। हां, अगर आसपास मुनिराज हों तो उनके द्वारा सूरिमंत्रित करवा सकते हैं। यह अच्छा है। परन्तु बिना मुनि के सूरिमंत्रित प्रतिमा अपूज्यनीय कदापि नहीं हो सकती है। सवस्त्र भट्टारकों द्वारा एवं प्रतिष्ठाचार्यों द्वारा सूरिमंत्रित मूर्तियां 50 साल पूर्व तक की 100% हैं और अभी तक कई मूर्तियां मुनियों के बिना सूरिमंत्रित हो रहीं हैं। आर्यिका माताजी के सानिध्य हो रहे पंच कल्याणकों में सूरिमंत्र प्रतिष्ठाचार्य ही देते हैं। इस बात का कई आचार्य, मुनि, आर्यिका, विद्वान समर्थन करते हैं। 


*? - पहले मुनि नहीं थे तब सवस्त्र भट्टारक एवं प्रतिष्ठाचार्य सूरिमंत्र देते थे लेकिन जब वर्तमान में मुनिसंघ हैं तब उनसे ही सूरिमंत्र दिलवाना चाहिए।*

= ये बात सही है कि इससे पंचकल्याणक एवं मूर्ति प्रतिष्ठा में विशेषता आती है। परन्तु उस समय आसपास मुनिसंघ उपलब्ध नहीं हों तो प्रतिष्ठाचार्य सूरिमंत्र दे सकते हैं।


*?- मुमुक्षुओं के किसी भी मूर्तियो में मुनियों द्वारा सूरिमंत्र नहीं दिलवाया गया?*

= ये बात सही नहीं है। आचार्य शान्तिसागरजी हस्तिनापुर वाले, मुनि निर्वाण सागरजी, मुनि कैलाशसागरजी आदि आचार्य एवं मुनियों ने मुमुक्षु समाज के पंचकल्याणकों में सानिध्य भी प्रदान किया है एवं सूरिमंत्र भी दिया है। केसली (सागर) पंचकल्याणक में स्वयं आचार्य विद्यासागर जी महाराज का संघ  का सानिध्य था एवं उन्होने ही सूरिमंत्र दिया। इसलिए ये कहना असत्य एवं भ्रामक है कि मुमुक्षु मन्दिरों में मुनियों ने सूरिमंत्र नहीं  दिया। 


*?- मुमुक्षु मन्दिरों की प्रतिष्ठा दिगम्बर आम्नाय के अनुसार नहीं होती है इसलिए मुमुक्षु मूर्तियां पूज्यनीय नहीं हैं?*

= सोनगढ़ के प्रथम एवं आगे की प्रतिष्ठायें दिगम्बर जैन समाज के सर्वमान्य प्रतिष्ठाचार्य पण्डित नाथुलालजी इन्दौर द्वारा हुई हैं। अन्य मुमुक्षु मन्दिरों की प्रतिष्ठायें भी उन्हीं के द्वारा प्रशिक्षित प्रतिष्ठाचार्यों द्वारा हुई हैं। जिसमेंप्रमुख प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्र. अभिनन्दन कुमारजी शास्त्री खनियांधाना हैं जिन्होंने अभी तक 100 पंचकल्याणक प्रतिष्ठा यें सम्पन्न करा चुके हैं। जो घोषित तेरापंथ आम्नाय के अनुसार होती हैं। मुमुक्षु मन्दिरों का संचालन भी तेरापंथ के अनुसार होता है।


*?- तेरापंथ तो 300-400 वर्ष पहले पण्डित बनारसी दास द्वारा घोषित एवं पण्डित टोडरमलजी द्वारा विस्तारित है। दोनों ही गृहस्थ हैं इसलिए वे मान्य नहीं हैं ना उनकी परम्परा?*

= ये सही है कि ये दोनों गृहस्थ विद्वान हैं। लेकिन इन्होने कोई नयी परम्परा नहीं बनाई है, पूर्व में चली आ रही निर्दोष वीतरागी आध्यात्मिक परम्परा को ही आगे बढ़ाया है। शिथिलाचार आदिनाथ भगवान के समय से चला आ रहा है इसलिए मूल वीतरागी रत्नत्रय मार्ग को समय पर नया नाम दिया जाता रहा है ताकि मूल मोक्षमार्ग बचा रहे। अन्य मतियों से अलग तीर्थंकर/ श्रमण मार्ग, श्वेताम्बरों से बचने के लिए दिगम्बर, भट्टारकों से बचने के लिए तेरापंथ नाम आया। मूल सिद्धान्त और मूलाचार की सुरक्षा ही मुख्य उद्देश्य सदैव रहा है। अगर यह कार्य पण्डित बनारसी दास और टोडरमलजी ने किया तो अच्छा ही है। जब मुनि नहीं थे तब गृहस्थ विद्वत् परम्परा भी प्रभावी मार्गदर्शक रही है। अभी भी मुनिसंघ हैं तब भी विद्वानों का योगदान रहता ही है। इसलिए विद्वानों द्वारा लिखित, टीका, सम्पादित, अनुवादित शास्त्र मान्य हीं हैं क्योंकि उसमें तीर्थंकरों का निर्दोष मार्ग ही बताया है। 


*?- क्या बीसपंथ आम्नाय से प्रतिष्ठित मूर्ति पूज्यनीय है?*

= प्रतिष्ठा विधि में तेरा और बीस का विशेष अन्तर नहीं है। अगर प्रतिमा प्रतिष्ठित है,  चंदन- फूल से रहित है तो पूज्यनीय है। गोम्मटेश बाहुबली में सब अपनी अपनी परम्परानुसार अभिषेक- पूजन करते ही हैं। कानजी स्वामी ने तीन वार पूरे दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्रों की वंदना की उसमें सब जगह अभिषेक और पूजन भी की। आज भी सभी मुमुक्षु करते ही हैं। लगभग सभी मुनिसंघ एवं गृहस्थ तेरा-बीस-मुमुक्षु मन्दिरों में जाते ही हैं। जो नहीं जाते हैं उनकी या उनके संघ की अलग मान्यता/आग्रह हो सकती है। अभी एक फोटो वायरल हो रहा है जिसमें आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज मुमुक्षु मन्दिर में दर्शन कर रहे हैं। 


*?- कोई मुनि मुमुक्षु मन्दिर में नहीं आते हैं तो नहीं आयें, उनकी स्वतंत्रता है आपको क्या आपत्ति है?*

= मुमुक्षु समाज के मन्दिर सबके लिए तेरापंथ के अनुसार दर्शन- पूजन के लिए खुले रहते हैं। और जब आचार्य/मुनि/आर्यिका  दर्शनार्थ आते हैं तो प्रबंध समिति उनकी विशेष व्यवस्था भी करती है‌। टोडरमल स्मारक जयपुर में मुनिसंघों की आगवानी एवं प्रवचन आदि भी किये गये। जो आमंत्रित/ निवेदन करने पर भी नहीं आना चाहते हैं उसमें कोई क्या कर सकता है। सबकी स्वतंत्रता है। लेकिन ये आग्रह कि - चाहे मन्दिर- मूर्ति आगम- परम्परा  सम्मत हों, अन्य मुनिसंघ दर्शंन करते हों लेकिन मैं नहीं जाता, ना मानता हूॅं। और फिर  शुद्धिकरण के नाम पर मन्दिर तोड़ना, मूर्ति की प्रशस्ति मिटाकर पुनः प्रतिष्ठा करवाना ये उचित नहीं है, आगम- परम्परा सम्मत नहीं है। इससे समाज में अशान्ति और अराजकता फैलेगी। और  साथ ही भविष्य में जब जिसका प्रभाव बढ़ेगा वह अपने हिसाब से परिवर्तन करता रहेगा। ये स्थाई अशान्ति और अराजकता का कारण है। आप अलग से अपनी मान्यतानुसार कितने ही मन्दिर - मूर्ति बनवायें इसमें आपत्ति नहीं है। वैदिक-बौद्ध-मुस्लिम- ईसाईयों ने  सत्ता के बल पर खूब जैन मन्दिर- मूर्तियां तोड़ी, कब्जा किये। परन्तु जैन शासकों कभी भी किसी अन्य धर्म के मन्दिर- मूर्ति को तोड़कर जैन नहीं बनाई। नये बनवाये। वैसे भी जैन सृजनकर्ता हैं विध्वंसक नहीं। लेकिन जब अपने ही अपनी विरासत- धरोहर बदलने लगे तो जैनधर्म एवं जैन समाज कैसे सुरक्षित, विकसित होगा? इस पर विचार होना चाहिए।


*?- कानजी स्वामी श्वेताम्बर थे एवं उनका मरण अस्पताल में हुआ था इसमें वे ना जैन हैं ना दिगम्बर। इसलिए उनके द्वारा निर्मित मन्दिर - मूर्ति - शास्त्र को नहीं मानते हैं।*

= ये सही है कि कानजी स्वामी मुंहपट्टी वाले स्थानकवासी श्वेताम्बर जैन बड़ी मान्यता वाले साधु थे। परन्तु उन्होंने दिगम्बर शास्त्रों को पढ़कर अपना मत परिवर्तन किया और दिगम्बर गृहस्थ घोषित किया। और आजीवन दिगम्बर जैन तेरापंथ के अनुसार सैद्धांतिक और आचारगत जीवन यापन किया। अन्य मत से जैनधर्म स्वीकार करने वाले बहुत से महापुरुष हैं इससे उन पर प्रश्नचिह्न खड़ा नहीं किया जा सकता है। प्रथम गणधर इन्द्रभूति गौतम और उनके 500 शिष्य ब्राह्मण थे। जम्बूस्वामी के साथ दीक्षित होने वाले 500 चोर किस जाति के थे? जैन स्वतंत्र जाति तो है नहीं। मूल रूप से तीर्थंकरों के वंशज जैन हैं जो क्षत्रिय थे। ब्राह्मण और वैश्य भी जैन धर्मावलंबी थे। इनके अलावा कथिक अस्पृश्य शूद्र भी पंचम गुणस्थानवर्ती क्षुल्लक दीक्षा तक लेकर अपना कल्याण  कर सकता है। इसलिए जैन धर्म में ऐसा जातिगत प्रतिबंध नहीं है। फिर कानजी स्वामी तो जैन ही थे। रही बात अस्पताल में मरण की तो आज भी जैन विद्वान और संयमी भी अस्पताल में भर्ती हुए ऐसे उदाहरण हैं। लेकिन वहां दवाईयों का भक्षण नहीं किया। कानजी स्वामी अविरत गृहस्थ थे। उनके प्रतिमायें नहीं थी फिर उनका सदाचार श्रेष्ठ था। 

*?- सोनगढ़ वाले 25 तीर्थकर मानते हैं और 25 वां तीर्थंकर कानजी स्वामी को मानते हैं जो आगम सम्मत नहीं है इसलिए समाज में उनका विरोध है।*

= सोनगढ़ वाले भी  24 ही तीर्थंकर मानते हैं। ये गलत प्रचार किया जाता है। चंपावेन के कथित जातिस्मरण ज्ञान के आधार पर कानजी स्वामी को   विदेह क्षेत्र संबंधी सूर्यकीर्ति नामक भावी तीर्थकर होना बताया जाता है। ऐसे भावी तीर्थकर सूर्यकीर्ति की मूर्तियां कुछ स्थानों पर हैं। कानजी स्वामी ने जातिस्मरण के आधार पर मूर्ति बनाने एवं इस पृरकार के प्रचार का स्पष्ट निषेध किया था इसलिए उनके जीवन काल में सूर्यकीर्ति भावी तीर्थकर की मूर्ति नहीं बनीं। परन्तु उनके जाने के बाद चंपावेन के विशेष अनुराग और आग्रह से मूर्ति प्रतिष्ठित हुईं जिसका मुमुक्षु समाज एवं अन्य जैन समाज ने पूरा विरोध किया। इस वजह से टोडरमल स्मारक जयपुर के नेतृत्व में सोनगढ़ की सूर्यकीर्ति धारा से मुमुक्षु समाज अलग हुआ और आज भी मुमुक्षु समाज में भावी तीर्थकर सूर्यकीर्ति की प्रतिमा को मान्यता नहीं है। 


*? अगर कानजी स्वामी सही थे तो उनका जैन समाज में विरोध क्यों?*

= नये का विरोध होना 

स्वाभाविक है। विरोध से दोनों पक्षों को लाभ होता है। इससे विश्लेषण/समीक्षा/आत्मावलोकन अच्छी तरह से हो जाता है। वाद-विवाद प्रतियोगिता में पक्ष- विपक्ष बनाये ही इसीलिए हैं। आचार्य समन्तभद्र ने परीक्षा करने को प्रमुखता दी है। चूंकि सच्चे देव-शास्त्र-गुरु के सच्चे श्रद्धान से सम्यग्दर्शन होता है तो फिर इनका क्या स्वरूप है?- इसको भी समझना अत्यन्त आवश्यक है। विरोध के तीन कारण होते हैं- गलत होना, गलत पता होना या सब पता होते हुए भी गलत तरीके से प्रस्तुत करते हुए अपनी मार्केटिंग के लिए विरोध करना। जैन धर्म में विरोध होता रहा है- जैनों अजैनों के बीच, दिगम्बर श्वेताम्बरों के बीच, दिगम्बरों में मूलसंघ और या अन्य संघों के बीच, भट्टारकों और मूल संघियों के बीच, तेरापंथ और बीस पंथियों के बीच। अब विरोध है सोनगढ़/कानजी स्वामी और स्व घोषित मुनिभक्तों के बीच। पहली बात तो कानजी स्वामी ने कभी भी मुनियों का विरोध नहीं किया। उनके सारे प्रवचन रिकार्डिड हैं जो नेट पर हैं सुने जा सकते हैं। उन्होंने तो अपने को दिगम्बर मुनियों का दासानुदास कहा है। उन्होने दिगम्बर मुनियों की ही लिखित वाणी का स्वाध्याय किया है। हां, उन्होंने विरोधियों की बात का ना जबाव दिया है ना प्रतिकार किया है। वे उन्हें भूलेला भगवान् कहते थे। डॉ. भारिल्ल कहते थे कि गोली का जबाब गाली से भी नहीं। अपना समय और ऊर्जा तत्वाभ्यास में ही लगाना चाहिए। कानजी स्वामी और डॉ. भारिल्ल ने जीवन पर्यन्त इस नीति का पालन किया। हां, विरोध में कही बात में से कहीं अपने में सुधार की गुंजाइश दिखी तो शीघ्र ही सुधार किया। यह विशेषता रही। और मैं समझता हूं मुमुक्षु समाज आज भी इसी नीति पर चलने में विश्वास करता है। 


*?- कानजी स्वामी/मुमुक्षुओं को मुनि विरोधी क्यों माना जाता है?*

= कानजी स्वामी का दिगम्बरों में उदय तेरापंथ आम्नाय में हुआ। तेरापंथ में पाण्डे राजमल्लजी, पण्डित बनारसी दास, पण्डित टोडरमलजी, पण्डित दौलतरामजी, पण्डित सदासुखदासजी आदि विद्वान कृत हिन्दी टीकायें, शास्त्र, पूजन  भजन आदि थे जिसके आधार से ही मुख्य रूप से उत्तर भारत में धर्म साधना होती थी। बीसपंथी मन्दिरों में बीसपंथ के हिसाब से पूजन पाठ होता था। आचार्य शान्तिसागरजी दक्षिण और आचार्य आदिसागरजी के उत्तरभारत प्रवास में स्थिति बदली। दक्षिण भारत का क्षेत्रपाल, पद्मावती, यक्ष, देवी- देवता पूजन, स्त्री द्वारा अभिषेक, पंचामृत अभिषेक, रात्रि पूजन एवं भट्टारकवाद आदि पद्धति जिन मुद्रा के कारण उत्तर भारत में फैली। उत्तर भारत के तेरापंथ समर्थक आचार्य शान्तिसागरजी छाणी का उदय भी समकालीन था, इस परम्परा में भी अच्छे साधु और आर्यिका माताजी हुए लेकिन शान्त और सहज वृत्ति होने के कारण पूरे देश में प्रभावी और निर्णायक स्थिति में कम रहे। कानजी स्वामी ने आचार्य कुन्दकुन्द आदि प्राचीन आचार्यों के माध्यम से दिगम्बर जैन सिद्धान्त एवं आचार पम्परा को जो विशुद्ध थी। मोक्षमार्ग प्रकाशक से वे इसलिए प्रभावित थे कि उसमें तत्व विवेचना, शास्त्रों को समझने का तरीका, अन्यमत- श्वेताम्बर- क्षेत्रपाल पद्मावती आदि के स्वरूप एवं पूज्यता संबधी सही विश्लेषण द्रढता से किया गया था। छह अनायतन- कुदेव, कुगुरु, कु शास्त्र  एवं इनके मानने वाले और 3 मूढता की समझ पैदा करती है। सैद्धांतिक, लौकिक और धार्मिक शिथिलाचार कानजी स्वामी ने श्वेताम्बर जीवन में खूब देखा था। वहां शिथिलाचार को नहीं मानने की आजादी नहीं थी जिससे त्रस्त होकर बेचेन रहते थे। जब दिगम्बरत्व का स्वरूप भासित हुआ तब उन्होंने द्रढता पूर्वक मूल सिद्धान्त और मूल आचार को ही श्रद्धा का विषय बनाया। जीवन पर्यन्त ना शिथिलाचार अपनाया, ना स्वीकार किया ना समझौता किया। यही सत्य का आग्रह  उनके विरोध का कारण बना। यही वर्तमान मुमुक्षुओं के साथ हो रहा है। 


*?- उनके विरोध का कारण व्यवहार धर्म/ नय को नहीं मानना भी रहा है क्या ये बात सही है?*

= कानजी स्वामी का स्वाध्याय एवं प्रवृत्ति शास्त्रानुसार रही है। शास्त्रों में जिस प्रकार निश्चय व्यवहार का स्वरुप कहा है वैसा वे मानते थे। अनेकान्त और स्याद्वाद की सही समझ उन्हें थी। ये बात शास्त्र स्वाध्याय करने से ही समझ में आ सकती है इसलिए उन्होंने हमेशा शास्त्र स्वाध्याय को प्रमुखता दी। उन्होंने हमेशा पंक्तिबद्ध शास्त्र स्वाध्याय किया चाहे कितना बड़ा कार्यक्रम हो पंचकल्याणक, शिविर या अन्य प्रसंग। मुमुक्षु श्रोता भी शास्त्र एवं नोटबुक लेकर बैठते थे। व्यवहार नय के बिना निश्चयनय नहीं बन सकता है इन दोनों के सामंजस्य से ही तत्वबोध होता है। व्यवहार नय के विलोप से धर्म तीर्थ नष्ट हो जायेगा और निश्चय नय के निषेध से तत्व लुप्त हो जायेगा। इसलिए जैन दर्शन में अनेकान्तवाद सर्व मान्य है। इसी प्रकार यथायोग्य शुद्धोपयोग रूप निश्चय धर्म बढ़ने पर सम्यक्ताचार , प्रतिमाचार एवं संयमाचार रूप व्यवहार धर्म प्रकट होता ही है। इसमें से कोई एक धर्म अलग नहीं रह सकता है। कानजी स्वामी ने अविरत गृहस्थ रहते हुए उचित व्यवहार धर्म का पालन किया है। श्रद्धान में पुण्यभाव/तत्व आस्रव तत्व होने के कारण सदैव हेय रहा है परन्तु यथायोग्य पुण्यक्रिया ज्ञानीजीव के रहती ही है। पुण्यक्रिया का निषेध आगम में कभी नहीं रहा।


*?- मोक्ष जाने के लिए मुनि बनना आवश्यक नहीं है गद्दी पर बैठे बैठे मोक्ष हो जायेगा- ऐसा कानजी स्वामी कहते थे-ऐसा प्रचार किया जाता है, क्या ये बात सत्य है?*

= ये जानबूझ कर भ्रामक- झूठा प्रचार है ऐसे अनेक झूठी बातें फैलाकर नकारात्मक वातावरण बनाया जाता है। इस प्रकार प्रायोजित नैरेटिव से समाज में अशान्ति और अराजकता रही है। गुणस्थान परम्परानुसार प्रत्येक मोक्षगामी जीव 6-7 वें गुणस्थान में आना आवश्यक है जो निर्ग्रन्थ मुनिराजों को ही होती है। आगे के गुणस्थान भी निर्ग्रन्थ मुनिराज ही प्राप्त करते हैं। तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलभद्र, कामदेव पद धारी भी राजपाठ छोडकर मुनि बने तभी मोय प्राप्त  हुआ। यही कानजी स्वामी मानते थे और वर्तमान में मुमुक्षु मानते हैं। मनगढ़ंत बात फैलाकर समाज को भ्रमित किया जाता रहा है। 


*?- क्या कानजीपंथ समाज की अशान्ति का कारण है?*

= कानजी स्वामी आत्महित के लिए दिगम्बर मती बने थे। स्वाध्याय शील होने के कारण अपने साधर्मियों के साथ करते थे। जैसे जैसे कुनवा बढ़ता वैसे-वैसे स्वाध्याय भवन, मुमुक्षु मण्डल और जिन मन्दिर बनते गये। आचार्य कुन्दकुन्द से लेकर पण्डित टोडरमलजी तक के अध्यात्मधारा का ही प्रचार हुआ जो मूलसंघ और अब तेरापंथ के नाम से जानी जाती है। कानजी स्वामी या सोनगढ़ पंथ नाम की कोई चीज ही नहीं है ये सब आअपने आपको दिगम्बर जैन तेरापंथी मानते हैं। लेकिन विरोधियों ने इन पंथों का नाम दिया जबकि मुमुक्षु इन आरोपित नामों के ना समर्थक हैं  सन्तुष्ट। कानजी स्वामी ने मूल शास्त्रों के अलावा कोई बात ही नहीं की। अस्त्र- शस्त्र- वस्त्र, चंदन- माला युक्त प्रतिमा या देवी- देवता की मान्यता तेरापंथ में नहीं है, मंदिर में दीप-धूप का प्रयोग नहीं होता है आदि 13 बातें जो तेरापंथ के नाम से प्रसिद्ध हैं उसका पालन करते थे। इसी प्रकार जो स्वरूप शास्त्र, गुरु एवं धर्म का कहा है तेरा पंथानुसार उसी की मान्यता रही है। शिथिलाचार का पोषण नहीं किया। जिनवाणी का प्रचार किया, जिन मन्दिर बनवाये, स्वाध्याय भवन बने, पाठशाला चलीं, दैनिक स्वाध्याय चालू हुआ, शिविर लगे, सामूहिक यात्रायें, शुद्ध पंचकल्याणक हुए, विद्यालय - महाविद्यालय खुले आदि रचनात्मक कार्यक्षही मुमुक्षु समाज द्वारा हुए। एक भी ऐसा कार्य नहीं हुआ जो समाज में अशान्ति का कारण बनें। फिर समाज अशान्ति कैसे फैली? यह प्रश्न शोध का विषय है। कानजी स्वामी के दिगम्बर धर्म स्वीकार करने से देहपरिवर्तन के काल   की समीक्षा की जानी चाहिए। गृहीत मिथ्यात्व एवं शिथिलाचार के वे प्रबल विरोधी थे। जो संघर्ष पहले आचार्य कुन्दकुन्द ने दिगम्बरत्व को बचाने के लिए किया, पण्डित बनारसीदास और पण्डित टोडरमलजी ने मूलाचार को बचाने के लिए किया वही कार्य कानजी स्वामी ने मूलमार्ग और मूलपरम्परा बचाने के लिए किया। प्रमुखता आत्महित की रही। आज जब मुमुक्षु दिगम्बर जैन तेरापंथ धारा में स्थापित हो चुके हैं एवं संख्यात्मक और गुणात्मक वृद्धि हो रही है, देश -विदेश में दिगम्बर जैन धर्म का डंका बज रहा है उसमें महत्वपूर्ण योगदान मुमुक्षु समाज का है। फिर भी समाज में अशान्ति फैल रही हो तो समाज विचार करे कि वे कारक तत्व कौन हैं? आज तेरापंथ समाज को मूलमार्ग से भटकाने का सुनियोजित कार्य हो रहा है। कथित तेरापंथी ही अपनी जड़ें खोद रहे हैं।

डॉ.अरविन्द कुमार जैन

एयपुर-9529530051

20/06/2026

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