16.बंगाल ट्रेंड- जनता न्याय ?

 *बंगाल ट्रेंड - जनता न्याय?*  ***********************   

  बंगाल चुनाव-2026 के बाद त्रसित जनता सड़कों पर है और दमनकारी, रिश्वतखोर, शोषणकारियों पर सीधे कार्यवाही कर रही है। यद्यपि यह अराजकता ही है तथापि लगता न्याय जैसा है। ना मुकद्दमा, ना अपील, ना सुनवाई सीधे कार्यवाही। बंगाल राज्य, बंग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल, अमेरिका आदि में जनता ने सीधे कार्यवाही की है। लेकिन इसे अन्तर की द्रष्टि से देखा जाये तो 2026 का बंगाल के जनता न्याय में ना सार्वजनिक हिंसा हो रही है, ना लूटपाट।  ना मन्दिर- मस्जिद - गुरुद्वारा टारगेट हो रहे हैं ना बस- ट्रेन आदि सार्वजनिक सम्पत्ति। केवल भ्रष्ट राजनेताओं को सड़क पर दौडाया जा रहा है, काला मुंह और जूतों की माला। लोग अपने पैसे मांग रहे हैं और भयभीत भ्रष्ट नेता घर-घर जाकर, केम्प लगाकर, घोषणा करके माफी मांगते हुए पैसा लौटा रहे हैं। यह अराजकता सकून भरी सी लगती है लेकिन इसका दूसरा पक्ष काफी काला है। शासन- प्रशासन की इच्छा शक्ति, सामर्थ्य पर प्रश्नचिन्ह है। जनता मुकद्दमा करती और उसे इसी गति और स्पष्टता से न्याय मिलता तो शायद लोकतंत्र मजबूत होता। लेकिन हो कुछ हो रहा है वो सब शायद शासन- प्रशासन के संज्ञान में है। मजेदार बात यह है कि किसी भी सरकारी कर्मचारी पर आक्रोश नहीं दिख रहा जबकि दमन- शोषण इन सबने भी किया है लेकिन जनता जानती है कि किसकी तह पर किया। 

     अगर *बंगाल का जनता न्याय* सारे देश में सरकार बदलने के बाद होने लगे तो बदल- बदलकर हर पांच साल में पक्ष- विपक्ष के भ्रष्टाचारियों पर अंकुश लगेगा। सब जानते हैं कि भ्रष्टाचार की जननी राजनीति है वही इसे साफ कर सकती है, कर्मचारी, दलाल तो मोहरें हैं। हद तो तब हो जाती है जब सरकार स्वयं अपने कर्मचारियों से पोस्टिंग, ट्रांसफर,  प्रमोशन के बदले खुले आम पैसा लेती है। पहले बाबूओं के माध्यम से ली जाती थी और अब सीधे विधायक-सांसद-मंत्री ले रहे हैं। चाहे किसी भी पार्टी के हों। इस विषय में पांचों अंगुलियों बराबर हैं जो खाने के समय ही होती हैं। इसमें धर्म, जाति, वर्ण, देशभक्ति आड़े नहीं आती है। जैसे दूध वाला बिना पानी के दूध नहीं देता है, बिना मिलावट के सुनार गहने नहीं देता है वैसे ही यह दस्तूर बन गया है। न्यायपालिका पर प्रश्न उठाना उचित नहीं है क्योंकि वो स्वयं उठाती रहती है हां, दूसरा उठाये तो खैर नहीं। जले नोटों के बंगल सबको ध्यान है परन्तु ऐसे बिना जले बंडलों की भरमार है लेकिन हाथ कौन डाले। जब खेत ही बाड़ खाने लगे तो न्याय कौन पर जाये। लेकिन जनता न्याय में सब संभव है। 6 महिने बाद यही नेता भ्रष्टाचार की गंगोत्री बहायेंगे जो भ्रष्टाचार के नाम पर *जनता न्याय* को प्रश्रय दे रहे हैं चाहे इसके हिसाब भी  आने वाली सरकार करे। इतना भय तो भ्रष्टाचारियों में होना ही चाहिए। अराजक तत्व भी इसी समय लाभ उठाते हैं इसका हिसाब कौन रखेगा?

       जनता न्याय के बहाने ही अमेरिका राष्ट्रपति भवन, बंगलादेश प्रधानमंत्री आवास, नेपाल के सरकारी भवन आदि लूटे और नष्ट किये गये थे। जनता का शिक्षण- प्रशिक्षण यहीं से प्रारंभ होता है फिर लूट की आदत। लेकिन समय की मांग क्या है न्याय इस पर निर्भर करता है। 

-डॉ. अरविन्द कुमार जैन

    95295 30051

10/06/2026

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