18.अनेकान्तोSप्यनेकान्त: (भाग-2)
अनेकान्तोSप्यनेकान्त: (भाग-2)
- आचार्य समन्तभद्र, स्वयंभू स्तोत्र- 103
अनेकान्त स्वरूप जिनवाणी को *अनेकान्तमयी मूर्ति* कहा है-
अनन्तधर्मणस्तत्वं, पश्यन्ती प्रत्यगात्मन:। अनेकान्तमयी मूर्तिर्नित्यमेव प्रकाशताम्।। समयसार कलश-2, अर्थात् अनेकधर्म हैं जिसमें ऐसे श्रुत रूप मूर्ति सदा ही प्रकाशित होवे। अनन्त धर्म वाले आत्मतत्व को वह मूर्ति अवलोकन करती है।
अनेकान्त और स्याद्वाद जैन धर्म के प्रसिद्ध और प्रमुख सिद्धान्त हैं। परन्तु सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि जैनेतर विद्वानों के साथ कई जैन भी इसके रहस्य को नहीं समझ पाते हैं इसका लक्षण है जिनागम के कथनों को लेकर विसंवाद।
जैनाचार्यों ने स्वयं सावधान किया है। अनेकान्त और स्याद्वाद का प्रयोग करते समय यह सावधानी रखना बहुत आवश्यक है कि हम जिन परस्पर विरोधी धर्मों की सत्ता वस्तु में प्रतिपादित करते हैं, उनकी सत्ता वस्तु में सम्भावित है भी या नहीं; अन्यथा कहीं हम ऐसा भी न कहने लगे कि कथंचित् जीव चेतन है व कथंचित् अचेतन भी। अचेतनत्व की जीव में सम्भावना नहीं है, अतः यहाँ अनेकान्त बताते समय अस्ति-नास्ति के रूप में घटाना चाहिए। जैसे- जीव चेतन (ज्ञान-दर्शन स्वरूप) ही है, अचेतन नहीं । वस्तुतः चेतन और अचेतन तो परस्पर विरोधी धर्म हैं और नित्यत्व-अनित्यत्व परस्पर विरोधी नहीं, विरोधी प्रतीत होने वाले धर्म हैं; वे परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं, हैं नहीं। उनकी सत्ता एक द्रव्य में एक साथ पाई जाती है। अनेकान्त परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले धर्मों का प्रकाशन करता है। जिनेन्द्र भगवान का स्याद्वादरूपी नयचक्र अत्यन्त पैनी धार वाला है। इसे अत्यन्त सावधानी से चलाना चाहिए, अन्यथा धारण करने वाले का ही मस्तक भंग हो सकता है इसे चलाने के पूर्व नयचक्र चलाने में चतुर गुरुओं की शरण लेना चाहिए। (गुरवो भवन्ति शरणं प्रबुद्धनयचक्रसंचारा:- (पु. सि.उ.-58)
अनेकान्त और स्याद्वाद सिद्धान्त इतना गूढ़ व गम्भीर है कि इसे गहराई से और सूक्ष्मता से समझे बिना इसकी तह तक पहुँचना असम्भव है; क्योंकि ऊपर-ऊपर से देखने पर यह एकदम गलत सा प्रतीत होता है। इस सम्बन्ध में हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी के दर्शन-शास्त्र के भूतपूर्व प्रधानाध्यापक श्री फणिभूषण अधिकारी ने लिखा है :-
"जैनधर्म के स्याद्वाद सिद्धान्त को जितना गलत समझा गया है, उतना किसी अन्य सिद्धान्त को नहीं । यहाँ तक कि शंकराचार्य भी इस दोष से मुक्त नहीं हैं, उन्होंने भी इस सिद्धान्त के प्रति अन्याय किया है। यह बात अल्पज्ञ पुरुषों के लिए क्षम्य हो सकती थी, किन्तु यदि मुझे कहने का अधिकार है तो मैं भारत के इस महान् विद्वान् के लिए तो अक्षम्य ही कहूँगा । यद्यपि मैं इस महर्षि को अतीव आदर की दृष्टि से देखता हूँ। ऐसा जान पड़ता है कि उन्होंने इस धर्म के दर्शन-शास्त्र के मूल ग्रन्थों के अध्ययन करने की परवाह नहीं की ।
हिन्दी के प्रसिद्ध समालोचक आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी लिखते हैं 'प्राचीन दर्जे के हिन्दू धर्मावलम्बी बड़े-बड़े शास्त्री तक अब भी यह नहीं जानते कि जैनियों का स्याद्वाद किस चिड़िया का नाम है।
श्री महामहोपाध्याय सत्य सम्प्रदायाचार्य पं० स्वामी राममिश्रजी शास्त्री, प्रोफेसर संस्कृत कॉलेज, वाराणसी लिखते हैं :-
"मैं कहाँ तक कहूँ, बड़े-बड़े नामी आचार्यों ने अपने ग्रंथों में जो जैनमत का खंडन किया है; वह ऐसा किया है, जिसे सुन-देख हंसी आती है, स्याद्वाद यह जैनधर्म का अभेद्य किला है, उसके अन्दर वादी-प्रतिवादियों के मायामयी गोले नहीं प्रवेश कर सकते।
जैन धर्म के सिद्धान्त प्राचीन भारतीय तत्त्वज्ञान और धार्मिक पद्धति के अभ्यासियों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इस स्याद्वाद से सर्व सत्य विचारों का द्वार खुल जाता है।
संस्कृत के उद्भट विद्वान् डॉ० गंगानाथ झा के विचार भी द्रष्टव्य है-
"जब से मैंने शंकराचार्य द्वारा जैन सिद्धान्त का खंडन पढ़ा है, तब से मुझे विश्वास हुआ कि इस सिद्धान्त में बहुत कुछ है, जिसे वेदान्त के आचार्य ने नहीं समझा और मैं जो कुछ अब तक जैन धर्म को जान सका हूँ, उससे मेरा दृढ़ विश्वास हुआ है कि यदि वे जैनधर्म को उसके मूल ग्रन्थों से देखने का कष्ट उठाते तो उन्हें जैनधर्म का विरोध करने की कोई बात नहीं मिलती। १
'स्यात्' पद का ठीक-ठीक अर्थ समझना अत्यन्त आवश्यक है। इसके सम्बन्ध में बहुत भ्रम प्रचलित हैं- कोई स्यात् का अर्थ संशय करते हैं, कोई शायद, तो कोई सम्भावना। इस तरह से स्याद्वाद को शायदवाद, संशयवाद, या सम्भावनावाद बना देते हैं।
शायद, संशय और सम्भावना में एक अनिश्चय है; अनिश्चय अज्ञान का सूचक है। स्याद्वाद में कहीं भी अज्ञान की झलक नहीं है। वह जो कुछ भी कहता है, दृढ़ता के साथ कहता है; वह कल्पना नहीं करता, सम्भावनाएँ व्यक्त नहीं करता।
श्री प्रो० आनन्दशंकर बाबूभाई ध्रुव लिखते हैं :-
"महावीर के सिद्धान्त में बताए गये स्याद्वाद को कितने ही लोग संशयवाद कहते हैं, इसे मैं नहीं मानता। स्याद्वाद संशयवाद नहीं है, किन्तु वह एक दृष्टि-बिन्दु हमको उपलब्ध करा देता है। विश्व का किस रीति से अवलोकन करना चाहिये यह हमें सिखाता है। यह निश्चय है कि विविध-बिन्दुओं द्वारा निरीक्षण किये बिना कोई भी वस्तु सम्पूर्ण स्वरूप में आ नहीं सकती। स्याद्वाद (जैन धर्म) पर आक्षेप करना यह अनुचित है।
इस प्रकार से हम देखते हैं कि जिनागम का अध्ययन करते समय जिनवाणी की शैली अनेकान्त को भली-भांति समझना चाहिए।
-डॉ.अरविन्द कुमार जैन
जयपुर-9529530051
07/05/2026
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