22. शताब्दी चिंतन: जैन समाज में परिवर्तन, बिडंबनाएं और आत्मविशुद्धि की राह
*शताब्दी चिंतन: जैन समाज में परिवर्तन, विडंबनाएँ और आत्मविशुद्धि की राह*
(सौ वर्षों का सिंहावलोकन और आत्मावलोकन की आवश्यकता)
विगत एक शताब्दी (100 वर्षों) का कालखंड धर्म, समाज और संस्कृति के स्तर पर अभूतपूर्व परिवर्तनों का साक्षी रहा है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी और भौतिक संसाधनों की दृष्टि से समाज ने निसंदेह बड़ी प्रगति की है। जैन धर्म के सिद्धांतों का वैश्विक मंचों पर प्रचार-प्रसार भी हुआ है। किंतु, इस बाह्य विस्तार के साथ-साथ क्या हमारी आंतरिक धर्म-निष्ठा और आचरण की शुद्धता सुरक्षित रह सकी?
जब हम 100 वर्षों की इस धार्मिक यात्रा का निष्पक्ष विश्लेषण करते हैं, तो प्रगति के साथ-साथ कई गहरी विडंबनाएँ और चिंताएँ भी सामने आती हैं। समय की माँग है कि हम दोषारोपण की शैली से ऊपर उठकर तटस्थ आत्मावलोकन करें, ताकि धर्म की मूल आत्मा- "सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्राणि मोक्षमार्ग-" अक्षुण्ण रह सके।
*1. भौगोलिक एवं परंपरा-गत रूपांतरण-तेरापंथ और बीसपंथ का बदलता स्वरूप*
उत्तर भारत, विशेष रूप से बुंदेलखंड, ऐतिहासिक रूप से विशुद्ध आम्नाय और मूलाचार-प्रधान परंपरा (तेरापंथ) का सुदृढ़ गढ़ रहा है। वहीं दक्षिण भारत में पौराणिक एवं अनुष्ठान-प्रधान शैली (बीसपंथ) का प्रभाव अधिक रहा है। परंतु विगत शताब्दी में एक बड़ा वैचारिक और व्यवहारगत उलटफेर देखने को मिला है-
*- उत्तर भारत में बीसपंथीय शैलियों का विस्तार-* बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में, जहाँ कभी वीतरागता और आचार-शुद्धता सर्वोपरि थी, वहाँ अब अनुष्ठानिक क्रियाकांड, बाह्य प्रदर्शन और बीसपंथीय शिथिलाचार का प्रभाव गहराई से बढ़ा है।
*-दक्षिण भारत में मूलाचार के प्रति रुझान-* इसके विपरीत, दक्षिण भारत में जहाँ पहले अनुष्ठानिकता की प्रधानता थी, वहाँ अब सैद्धांतिक अध्ययन, आचार-शुद्धता और मूलाचार के प्रति चेतना व प्रभाव बढ़ा है।
*विश्लेषण एवं समाधान-*
1.परंपराओं का यह भौगोलिक हस्तांतरण इस बात का संकेत है कि समाज जहाँ भी वैचारिक रूप से शिथिल हुआ, वहाँ बाह्य प्रभाव हावी हो गए। दक्षिण भारत में इस बढ़ते प्रभाव को स्थायी बनाने के लिए स्वाध्याय, तत्त्वज्ञान और आगम-सम्मत शिक्षण का निरंतर प्रवाह आवश्यक है। वहीं उत्तर भारत में मूल आगम-आधारित आचरण को पुनः जीवित करने के लिए विवेकपूर्ण प्रयास करने होंगे।
*2.दिगंबरत्व स्वीकारने वाले बंधु-* संस्कार-संरक्षण की चुनौती
विगत दशकों में अनेक श्वेताम्बर धर्मावलंबियों ने दिगंबर परंपरा की वीतरागता और दर्शन से प्रभावित होकर दिगंबरत्व अंगीकार किया है। यह धर्म-प्रभावना की दृष्टि से एक सुखद स्थिति है, किंतु इसके साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ी है:
*वर्तमान स्थिति*- पहली पीढ़ी ने तो भावुकता, समझ या आंतरिक प्रेरणा से दिगंबरत्व स्वीकार कर लिया, लेकिन उनकी आने वाली पीढ़ियों को इस परंपरा से जोड़े रखना कठिन सिद्ध हो रहा है।
*कारण-* पर्याप्त तत्त्व-शिक्षण का अभाव, पारिवारिक स्तर पर संस्कारों की कमी और केवल क्रियाकांड तक सीमित रह जाना।
*प्रेरणादायक पथ-* नए जुड़े परिवारों को केवल बाह्य आचरण तक सीमित न रखकर उन्हें *तत्त्वज्ञान, सम्यक्त्व और आगम-बोध* से गहराई से जोड़ना होगा, ताकि उनका दिगंबरत्व केवल परंपरा न बनकर आत्म-अनुभूति का आधार बने।
*3. मूलाचार में शिथिलता और बाह्य आडंबर बनाम आंतरिक विशुद्धि*-
वर्तमान समय की सबसे बड़ी चिंता यह है कि धर्म में 'प्रदर्शन' बढ़ता जा रहा है और 'दर्शन' (Philosophy) घटता जा रहा है।
*हो-हल्ला बनाम शांत शिथिलाचार-* परंपराओं में जहाँ एक ओर बाह्य आयोजनों, उत्सवों और प्रचार का अत्यधिक शोर (हो-हल्ला) है, वहीं दूसरी ओर मूलाचार की जड़ें अंदर ही अंदर खोखली हो रही हैं। बीसपंथीय या अन्य शिथिलाचार बिना किसी विरोध के शांति से समाज में अपनी जड़ें जमा रहा है।
*व्रत-पालन में विशुद्धि का ह्रास-* चाहे श्रावक के व्रत हों या मुनि-आचरण, बाह्य आडंबर और सुविधाओं का समावेशन बढ़ गया है। व्रत-नियम लेते समय जितनी उत्सुकता दिखाई देती है, उनकी आंतरिक विशुद्धि और कषाय-मंथरता में उतनी वृद्धि नहीं दिखती।
*"अन्तरंग दया शून्यं बाह्य चेष्टित मात्रकम्।"*
अर्थात् बाह्य आचरण चाहे कितना भी उत्कृष्ट दिखे, यदि अंतरंग में कषायों की मंदता और भाव-विशुद्धि नहीं है, तो वह मोक्ष-मार्ग का साधन नहीं बन सकता।
*4. सम्यक्त्व, नैतिकता और जीवनशैली का क्षरण-*
आज का समाज तकनीकी और आर्थिक रूप से समृद्ध हुआ है, परंतु आध्यात्मिक और नैतिक धरातल पर क्षरण हुआ है:
*अभक्ष्य एवं अनीति का समर्थन-* अव्रती समाज ही नहीं, बल्कि कई बार व्रत-नियमों का दावा करने वाले वर्ग में भी अनैतिकता, अनीतिपूर्वक धनार्जन और अभक्ष्य-भक्षण (खान-पान में अशुद्धता) के प्रति उपेक्षा या समर्थन देखा जा रहा है।
*मिथ्यात्व का समावेश-* अति-आधुनिकता और मानसिक तनाव के दौर में सम्यग्दृष्टि कहलाने वाले लोग भी अंधविश्वासों, गृहीत-मिथ्यात्व और अदेव-अशास्त्र-अगुरु के प्रति आकर्षित हो रहे हैं।
*5. विद्वत्ता बनाम प्रभावकारिता-* समाज के निर्देशकों का आत्मनिरीक्षण
समाज के मार्गदर्शक—चाहे वे विद्वान हों, त्यागी हों या समाज-नायक—उनकी भूमिका हमेशा से वटवृक्ष जैसी रही है। किंतु वर्तमान में यहाँ भी एक बड़ा बदलाव आया है:
*प्रभावक विद्वान बनाम आराधक विद्वान-* आज समाज में ऐसे वक्ताओं और विद्वानों की बहुलता है जो मंच से अपनी शैली और शब्दों के नवाचार से भीड़ को प्रभावित तो कर लेते हैं, किंतु उनमें स्वयं के जीवन में आगम-सम्मत साधना, विशुद्धि और निष्ठा की कमी दिखाई देती है।
*परिणाम-* जब प्रशिक्षक और मॉडल (दिशा-निर्देशक) ही केवल मंच-प्रभावना तक सीमित रह जाएँगे, तो समाज में गहरा आध्यात्मिक रूपांतरण असंभव हो जाएगा।
*आत्मनिरीक्षण-* शास्त्र-ज्ञान का उद्देश्य केवल 'वक्ता' बनना नहीं, बल्कि 'साधक' बनना है। जब तक विद्वत्ता के साथ आचरण की सुगंध नहीं मिलेगी, तब तक समाज को सच्ची दिशा नहीं मिल सकती।
*6. शताब्दी समीक्षा-* 'जैन' बने रहने का वास्तविक अर्थ
यदि हम विगत 100 वर्षों का निष्पक्ष लेखा-जोखा करें, तो प्रश्न यह नहीं है कि कितनी नई जिनालय-इमारतें बनीं या कितने बड़े आयोजन हुए, बल्कि प्रश्न यह है:
1.*क्या वास्तविक अर्थों में नए जैन बने?*— संख्यात्मक वृद्धि की तुलना में क्या हमने अन्य लोगों तक जैन दर्शन के अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत के व्यावहारिक स्वरूप को पहुँचाया?
2. *क्या जैनी 'जैनी' बने रह पा रहे हैं?* — जो जन्म से जैन हैं, क्या वे अपने दैनंदिन जीवन में देव-शास्त्र-गुरु की श्रद्धा, रात्रि-भोजन त्याग, छानकर जल पीना और कषाय-मुक्ति जैसे प्राथमिक जैन-संस्कारों को बचा पा रहे हैं?
आज स्थिति यह है कि कुल-परंपरा से जैन कहलाने वाले युवा भी अपनी मूल पहचान और संस्कारों से दूर हो रहे हैं।
*पाथेय और समाधान-* पुनर्जागरण की दिशा
चिंता व्यक्त करना पहला कदम है, परंतु समाधान खोजना अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। इस परिस्थिति से उबरने के लिए हमें निम्नलिखित बिंदुओं पर कार्य करना होगा:
1. *संस्थानों और आयोजनों से परे भाव-विशुद्धि पर बल-* भव्य आयोजनों की जगह व्यक्तिगत स्वाध्याय, ध्यान और भाव-विशुद्धि को प्राथमिकता दी जाए।
2. *बाल और युवा संस्कारों का सुदृढ़ीकरण-* नई पीढ़ी को केवल क्रियाकांड न सिखाकर, तर्कसंगत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से *तत्त्वज्ञान* सिखाया जाए।
3. *मूलाचार और विवेकपूर्ण आचरण का संरक्षण-* श्रावकों और मुनियों दोनों के स्तर पर आगम-सम्मत मर्यादाओं और मूलाचार का निष्पक्षता से पालन हो।
4. *सच्ची प्रभावना का स्वरूप-* प्रभावना केवल साधनों और आडंबरों से नहीं होती; आत्म-विशुद्धि और जीवन में दया, क्षमा, संतोष जैसे गुणों के प्रकट होने से ही धर्म की सच्ची प्रभावना होती है।
विनम्र निवेदन है कि विगत 100 वर्षों की यह समीक्षा हमें निराश करने के लिए नहीं, बल्कि *चेताने और जगाने* के लिए है। जैन धर्म अनादि-निधन है, इसका तत्त्वज्ञान सत्य पर आधारित है। आवश्यकता इस बात की है कि हम बाह्य आवरणों को हटाकर धर्म के मूल स्वरूप को पहचानें और अपने जीवन में उतारें। जब प्रत्येक व्यक्ति स्वयं के सुधार का संकल्प लेगा, तभी समाज और परंपरा का वास्तविक कल्याण संभव होगा।
- डॉ.अरविन्द कुमार जैन
- जयपुर - 9529530051
- दि.- 26/07/2026
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