गिरनार पर्वत विवाद: ऐतिहासिक धरोसशहर पर अतिक्रमण, मूल समस्या और समाधान
*गिरनार पर्वत विवाद: ऐतिहासिक धरोहर पर अतिक्रमण, मूल समस्या और समाधान*
हाल ही में जूनागढ़ (गुजरात) के जिला प्रशासन द्वारा गिरनार पर्वत पर जैन समाज को निर्वाण लाडू चढ़ाने की अनुमति को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर भगवान नेमीनाथ गिरनार की पांचवी टोंक से मोक्ष पधारे थे। इसी उपलक्ष्य में देशभर से जैन श्रद्धालु यहाँ निर्वाण लाडू चढ़ाने आते हैं। लेकिन इस बार, प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बिगड़ने के भय से मूल स्थान (पांचवी टोंक) के बजाय पहली टोंक पर लाडू चढ़ाने की अनुमति दी है। आस्था के मूल केंद्र पर पूजा से वंचित किए जाने के कारण देश-विदेश के जैन समाज में भारी आक्रोश है।
*गिरनार का ऐतिहासिक एवं जैन धार्मिक महत्व*
गिरनार पर्वत अपने प्राकृतिक सौंदर्य, झील-झरनों और सुरम्य वातावरण के कारण प्राचीन काल से ही यदुवंशी श्रीकृष्ण, राजाओं, विद्याधरों की क्रीड़ा स्थली और जैन मुनियों की साधना स्थली रहा है। जैन मान्यताओं के अनुसार, यहाँ से 72 करोड़ 700 मुनियों ने मोक्ष प्राप्त किया है। गिरनार पर्वत पर मुख्य रूप से पांच टोंक (शिखर) प्रसिद्ध हैं-
*प्रथम टोंक-* यहाँ दिगम्बर और श्वेताम्बर जैन मंदिर, राजुल गुफा, चंद्रगुफा और गोमुखी गंगा स्थित हैं, जहाँ चौबीस तीर्थंकरों के चरण विराजमान हैं।
*द्वितीय टोंक-* यह श्रीकृष्ण के पोते अनिरुद्ध कुमार की टोंक है। यहाँ अम्बादेवी का मंदिर भी स्थित है।
*तृतीय टोंक-* यह श्रीकृष्ण की रानी जाम्बवती के पुत्र शंभुकुमार की टोंक है।
*चतुर्थ टोंक-* यह श्रीकृष्ण की रानी रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न कुमार की टोंक है। यहाँ चरणों के साथ शिला में प्रतिमाएँ भी उत्कीर्ण हैं।
*पंचम टोंक-* यह सबसे प्रमुख टोंक है, जहाँ से भगवान नेमीनाथ (श्रीकृष्ण के चचेरे भाई) ने मोक्ष प्राप्त किया था।
*सहसावन-* यह भगवान नेमीनाथ का दीक्षा और केवलज्ञान प्राप्ति स्थल है।
*विवाद की जड़: चढ़ावे का लालच और अतिक्रमण-*
विवाद का मुख्य कारण चढ़ावा, प्रबंधन की लापरवाही और धीरे-धीरे हुआ अतिक्रमण है।
*शुरुआती दौर (1947 के आसपास)*- स्वतंत्रता के समय तक तलहटी में रहने वाले कुछ साधु-बाबा कलम कुंड में साधना करते थे और कभी-कभी चरणों पर चढ़ने वाला चढ़ावा लेने ऊपर आते थे। जैन श्रद्धालुओं को इससे आपत्ति नहीं थी, बल्कि एकांत और ऊंचाई पर उनकी उपस्थिति से सुरक्षा का भाव रहता था। जैन श्रद्धालु उन्हें चढ़ावे के अलावा दक्षिणा भी देते थे।
*प्रबंधन की चूक-* जैन पुजारी प्रतिदिन सभी टोंकों का अभिषेक-पूजन कर पहली टोंक पर वापस आ जाते थे। जैन समाज की सबसे बड़ी लापरवाही यह रही कि उन्होंने अपना स्वतंत्र और सख्त प्रबंधन तंत्र विकसित नहीं किया।
*कब्जे की शुरुआत-* इसी चढ़ावे और दक्षिणा ने लालच को जन्म दिया। धीरे-धीरे अन्य साधुओं ने नेमीनाथ भगवान के चरणों को 'भगवान दत्तात्रेय' के चरण बताकर दुष्प्रचार शुरू कर दिया। जबकि भगवान दत्तात्रेय का मूल स्थान तलहटी में है। जैन मूर्तियों को रंगकर और कपड़े पहनाकर ढक दिया गया।
*वर्तमान स्थिति और जैन समाज की पीड़ा*
आज स्थिति यह है कि राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक मिलीभगत से मूल जैन स्थलों (नेमीनाथ टोंक, देवी अम्बिका मंदिर, गोगंगा, राजुल गुफा) पर अतिक्रमण कर उनके नाम बदल दिए गए हैं।
*न्यायालय के आदेशों की अवहेलना-* गुजरात हाई कोर्ट ने सन् 2004 और 2005 में 'यथास्थिति' (Status Quo) बनाए रखने के आदेश दिए थे। कोर्ट ने सभी श्रद्धालुओं (दत्तात्रेय भक्त, नेमीनाथ भक्त और पर्यटक) को समानता से दर्शन-पूजन का अधिकार दिया था, लेकिन इसके बावजूद वहाँ अवैध निर्माण कार्य हुए।
*हिंसा और भय का माहौल-* शांतिप्रिय जैन समाज, मुनियों और भक्तों पर प्राणघातक हमले किए गए। उन्हें डराना, धमकाना और दर्शन से रोकना अब आम बात हो गई है। अल्पसंख्यक जैन समाज के धर्म और संस्कृति को सुनियोजित ढंग से मिटाने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है।
*समाधान और जैन समाज की प्रमुख मांगें*
गिरनार पर्वत पर अन्य साधुओं की साधना या आम पर्यटन से जैन समाज को कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मूल तीर्थ स्थल का संरक्षण आवश्यक है। इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए-
1.*पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI Survey)-* इस पूरे प्रकरण की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा निष्पक्ष जांच हो ताकि ऐतिहासिक सत्य सामने आ सके।
2.*1947 की स्थिति की बहाली-* तीर्थ स्थल को उसके मूल स्वरूप में लाया जाए और 1947 की स्थिति बहाल की जाए।
3.*न्यायालय के आदेशों का पालन- गुजरात हाईकोर्ट के 2004-2005 के आदेशों की सख्ती से पालना हो। दर्शन और पूजा का अधिकार सबके लिए हो, लेकिन संपत्तियों का प्रबंधन, नियंत्रण और अधिकार जैन समाज के पास सुरक्षित रहे।
4.*सुरक्षा की गारंटी-* जैन मुनियों और तीर्थयात्रियों पर होने वाले हमलों पर रोक लगे और उन्हें पूर्ण सुरक्षा प्रदान की जाए।
*निष्कर्ष और आत्म-मंथन*
गिरनार का यह विवाद सकल जैन समाज के लिए एक बड़ा सबक है। चढ़ावा, चंदा, दान और भिक्षा की आड़ में पनपने वाले लालच ने तीर्थों के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। अहिंसा, दया और क्षमा जैन धर्म के आभूषण हैं, लेकिन अपने अधिकारों और धरोहरों की रक्षा के प्रति उदासीनता अभिशाप बनती जा रही है।
जैन समाज को अपने सभी पूजा स्थलों के प्रबंधन और सुरक्षा तंत्र की गंभीर समीक्षा करनी चाहिए। उम्मीद है कि नीति और न्याय का समय अवश्य आएगा, जब गिरनार पर्वत अतिक्रमण मुक्त होगा और जैन श्रद्धालु अपनी पूरी धार्मिक आजादी के साथ पांचों टोंकों पर दर्शन-पूजन कर सकेंगे।
डॉ.अरविन्द कुमार जैन
जयपुर- 95295 30051
दि.- 16/07/2026
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