संस्थगत जड़ता का समाधान- समय के साथ अधिकारों का विकेन्द्रीकरण
"संस्थागत जड़ता का समाधान: समय के साथ अधिकारों का विकेन्द्रीयकरण"
किसी भी संस्था, समाज या परिवार के सतत विकास और जीवंतता के लिए समय के साथ अधिकारों का विकेन्द्रीयकरण (Decentralization of Power) अत्यंत आवश्यक है। अधिकारों को एक ही जगह केंद्रित रखने से "संस्थागत जड़ता" उत्पन्न होती है, जो विकास को अवरुद्ध करती है। अधिकारों का हस्तांतरण न केवल उत्तराधिकारियों को सक्षम बनाता है, बल्कि व्यवस्था को भी दीर्घायु करता है।
परिवार: विकेन्द्रीयकरण की प्रथम पाठशाला
अधिकारों के हस्तांतरण को एक परिवार के माध्यम से सरलता से समझा जा सकता है। यदि एक पिता के चार बेटे पढ़-लिखकर शिक्षित एवं व्यवसाय करने में सक्षम हो गए हैं, तो पिता का यह कर्तव्य है कि वह उन्हें स्वतंत्र जिम्मेदारी लेने के लिए प्रशिक्षित करे, उनकी योग्यता परखे और फिर उन्हें अधिकार सौंप दे।
इससे दो लाभ होते हैं—पिता को कार्यभार से राहत (सहारा) मिलती है और बच्चों को अपना विस्तार करने का अवसर। यदि बच्चे स्वतंत्र व्यवसाय या नौकरी करना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी योग्यता के चयन का अवसर और स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। जब बच्चों का अपना परिवार बसेगा, तब यह अनुभव उन्हें जीवन की परिस्थितियों का सामना करने में काम आएगा। परिवार के प्रत्येक सदस्य—जैसे बहुओं की अपनी रुचियां, भावनाएं और बच्चों के प्रति सपने होते हैं। इसलिए, बच्चों के प्रत्येक परिवार को समर्थ एवं पूर्ण बनाने का प्रयास होना चाहिए।
यह सोचना कि "मेरे जीवित रहते बंटवारा नहीं हो सकता," एक संकीर्ण सोच है। संपत्ति का बंटवारा हो या न हो, परंतु दायित्वों और निर्णयों में उन्हें स्वतंत्र अवश्य करना चाहिए। आप उन्हें स्वतंत्रता देंगे, तो वे सम्मान के साथ आपसे जुड़े रहेंगे; यदि आप उन्हें जबरन बांधकर रखेंगे, तो वे दूर भागने की कोशिश करेंगे।
सामाजिक संस्थाएं: नेतृत्व का हस्तांतरण और पीढ़ियों का समन्वय
यही सूत्र सामाजिक संस्थाओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। संस्थाओं में संरक्षक, मार्गदर्शक, कार्यकारिणी और साधारण सदस्य जैसे पद होते हैं। एक सफल नेतृत्वकर्ता वही है जो लोगों को पद, अधिकार और जिम्मेदारी सौंपता है, उन्हें कार्य सम्पन्न करना सिखाता है और निरंतर नए लोगों को अवसर प्रदान करता है।
वर्तमान समाज की विडंबना यह है कि 85-90 वर्ष के वयोवृद्ध महानुभाव अभी भी सक्रिय पदों पर काबिज हैं। उनके 30-35 वर्ष के पोते कॉर्पोरेट जगत में ऊंचे पैकेजों पर काम कर रहे हैं, लेकिन उन पोतों के पिता (50-60 वर्ष की आयु वाले) अभी भी सामाजिक स्तर पर स्वतंत्र निर्णय लेने में असक्षम हैं। इससे एक बहुत बड़ा पीढ़ीगत अंतराल (Generation Gap) पनपता है, जो समाज के लिए उचित नहीं है।
अपवाद स्वरूप 80 वर्ष के व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से सक्षम होकर गति से कार्य कर सकते हैं, जो कि अच्छी बात है। परंतु यक्ष प्रश्न यह है कि— *आपका उत्तराधिकारी कौन है? क्या उसे प्रशिक्षित किया जा रहा है?*
इसका दूसरा पहलू यह भी है कि नई पीढ़ी को अधिकार या पद मिलने पर बुजुर्गों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। समाज में ऊर्जा और नवीनता के साथ-साथ वरिष्ठों की योग्यता और अनुभव का भी अपना महत्व है। नई पीढ़ी को भी इस समन्वय को समझना चाहिए।
धार्मिक व्यवस्था: संघ संचालन और आगम के प्रमाण
धार्मिक क्षेत्र भी अधिकारों के विकेन्द्रीयकरण से अछूता नहीं है। दिगम्बर जैन आगम और इतिहास में इसके उत्कृष्ट उदाहरण मिलते हैं:
आचार्य अर्हद्बली का दृष्टांत- जब साधु संघ बहुत विशाल हो जाता है, तो दूरदर्शी आचार्य उन्हें उपसंघों में विभाजित कर देते हैं। इसका सबसे प्रामाणिक ऐतिहासिक उदाहरण आचार्य अर्हद्बली का है। जब उन्होंने देखा कि कालदोष से मुनियों का एक साथ रहना कठिन हो सकता है, तो उन्होंने श्रवणबेलगोला (महिमानगर/वेणकटगिरि) में मुनिसंघों का सम्मेलन बुलाया और संघ को नंदि, सेन, सिंह और देव संघों में विभाजित कर योग्य मुनियों को उनका स्वतंत्र आचार्य (अधिपति) बना दिया। यह संस्थागत जड़ता को रोकने का सबसे बड़ा ऐतिहासिक कदम था।
गणधर व्यवस्था- तीर्थंकरों के समवसरण में भी केवल एक व्यक्ति पर भार नहीं होता। एक से अधिक गणधर होते हैं जो अपने-अपने गण (समूह) का नेतृत्व करते हैं, यद्यपि मुख्य गणधर (जैसे भगवान महावीर के गौतम स्वामी) एक ही होते हैं।
वर्तमान में भी लगभग सभी साधु संघों में यही विकेन्द्रीयकरण की व्यवस्था है। जो संघ समय रहते दायित्वों का हस्तांतरण नहीं कर पाते, वे अक्सर आंतरिक कलह और विद्रोह के शिकार हो जाते हैं।
समाधि और पद-त्याग- आत्म-कल्याण का मार्ग
अधिकारों को छोड़ने का सबसे महत्वपूर्ण पहलू जीवन के अंतिम चरण (समाधि) से जुड़ा है। जैन धर्म का यह स्पष्ट विधान है कि समाधि (सल्लेखना) से पूर्व समस्त उपाधियों, पदों और परिग्रह से मुक्त होना अनिवार्य है, चाहे वह गृहस्थ की समाधि हो या साधु की।
शल्य रहित व्रत- आचार्य उमास्वामी तत्त्वार्थसूत्र (7.18) में कहते हैं- "निःशल्यो व्रती"। माया, मिथ्यात्व और निदान—इन तीन शल्यों से रहित होने पर ही व्रत फलते हैं। पद और अधिकार से जुड़ा मोह एक प्रकार का परिग्रह और निदान शल्य है।
आरंभ-परिग्रह का त्याग- गृहस्थ प्रतिष्ठाचार्य या विधि विधानाचार्य अपनी उत्तम समाधि के लिए अनुष्ठानों का त्याग कर देते हैं क्योंकि इनमें आरंभ (हिंसा) और देवी-देवताओं के आह्वान जनित दोष होते हैं। समाधि के लिए व्यक्ति को समस्त लौकिक कार्यों और जिम्मेदारियों से मुक्त होना ही पड़ता है।
चक्रवर्ती और नारायण की गति का सिद्धांत-
दिगम्बर जैन त्रिलोकसार आदि ग्रन्थों में स्पष्ट है कि यदि कोई चक्रवर्ती (छह खंड का अधिपति) अपने चक्रवर्ती पद (सत्ता और अधिकार) में रहते हुए मरण करता है, तो तीव्र आसक्ति और परिग्रह के कारण वह नियम से नरक जाता है (यद्यपि चक्रवर्ती की तीन गतियां- मोक्ष, स्वर्ग या नरक संभव हैं, पर पद में मरण नरक ही ले जाता है)। इसी प्रकार चक्रवर्ती की पट्टरानी, नारायण, प्रतिनारायण और रुद्र—ये सभी पद के तीव्र मोह और रौद्रध्यान के कारण नियम से नरक गामी होते हैं। इसके पीछे का मूल नियम यही है कि अधिकार और सत्ता से अत्यधिक आसक्ति (Attachment to Power) दुर्गति का कारण है।
संक्षेप में कह सकते हैं कि सत्ता, पद और अधिकारों से चिपके रहना न केवल संस्थाओं के विकास को रोकता है, बल्कि व्यक्ति के आध्यात्मिक पतन का भी कारण बनता है। अधिकारों का समयबद्ध स्थानांतरण या विकेन्द्रीयकरण व्यक्ति, परिवार, समाज और धर्म—सभी के हित में है। जब हम समय रहते अपनी जिम्मेदारियां नई पीढ़ी को सौंपते हैं, तभी हम संस्थागत जड़ता को समाप्त कर एक जीवंत और विकासशील समाज का निर्माण कर सकते हैं।
डॉ.अरविन्द कुमार जैन
जयपुर - 9529530051
दि.- 21/07/2026
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