सार्वजनिक संस्थाओं काप्रबंधन: लोकतांत्रिक व्यवस्था ही सुरक्षा और विकास का आधार

 *"सार्वजनिक संस्थाओं का प्रबंधन: लोकतांत्रिक व्यवस्था ही सुरक्षा और विकास का आधार"*

     सामाजिक या धार्मिक (मंदिर/तीर्थक्षेत्र) संस्थाओं की प्राथमिक सुरक्षा, विकास और स्थिरता की आधारशिला उनकी 'साधारण सभा' (General Assembly) होती है। साधारण सभा वह सर्वोच्च संवैधानिक निकाय है, जिसमें संस्था के विकास में योगदान देने वाले और उसे भविष्य में सँभालने वाले जागरूक सदस्य शामिल होते हैं। संस्था के रीति-नीति गत निर्णय, बजट, आय-व्यय का अनुमोदन, कार्यकारिणी का चयन और भावी योजनाएं इसी सभा की सहमति से तय होती हैं। इसमें ऐसे अनेक विचारवान लोग शामिल होते हैं, जो वैचारिक मतभिन्नता के बावजूद संस्था के हित में मन से अभिन्न होते हैं।

साधारण सभा के सदस्यों की संख्या संस्था के आकार-प्रकार पर निर्भर करती है, जो प्रायः कार्यकारिणी के सदस्यों की संख्या से 3, 5 या 10 गुना अधिक हो सकती है। इसी साधारण सभा के सदस्यों में से, 3 या 5 वर्षों के कार्यकाल के लिए एक प्रबंध कार्यकारिणी (जिसमें कम से कम 11 या इससे अधिक विषम संख्या में सदस्य हों) का चयन लोकतांत्रिक ढंग से किया जाता है।


*"व्यक्तिगत ट्रस्ट बनाम साधारण सभा: लाडनूं का उदाहरण"*

     जब कोई संस्था समाज के व्यापक सहयोग से संचालित होती है, तो वहां साधारण सभा का गठन सहज होता है। परंतु, जब कोई संस्था केवल एक या दो परिवारों के आर्थिक योगदान से स्थापित और विकसित होती है, तो वहां 'साधारण सभा' की अवधारणा कठिन हो जाती है। ऐसी स्थिति में अक्सर एक स्थायी ट्रस्ट बना लिया जाता है, जहाँ परिवार के लोग ही आजीवन ट्रस्टी होते हैं और भविष्य में उनकी ही संतानें (चाहे वे योग्य हों या नहीं) ट्रस्ट का संचालन करती हैं।

इस व्यवस्था का अपना औचित्य भी है। उदाहरण के लिए, राजस्थान के लाडनूं में बस स्टैंड पर स्थित भव्य मार्बल जैन मंदिर का निर्माण सुखदेव गंगवाल जी की स्मृति में उनके परिवार द्वारा करवाया गया था। इसके निर्माण और संचालन में बाहरी लोगों से कोई दान नहीं लिया गया; यहां तक कि मंदिर में कोई दानपात्र भी नहीं है। चूंकि मंदिर का संचालन एक ही सक्षम परिवार द्वारा पूरी तरह से निजी कोष से किया जा रहा है, इसलिए वहां किसी बाहरी हस्तक्षेप की न तो आवश्यकता है, न अपेक्षा है और न ही वह वैधानिक रूप से उचित है।


"*सार्वजनिक संस्थाओं में लोकतंत्र की अनिवार्यता: राम मंदिर का संदर्भ"*

     इसके विपरीत, जो संस्था भले ही किसी व्यक्ति या समूह द्वारा स्थापित की गई हो, परंतु जिसके निर्माण और संचालन में व्यापक जन-सहयोग और सार्वजनिक दान (Public Funding) शामिल हो, तो उसका प्रबंधन गंभीर विचार का विषय बन जाता है।

अयोध्या के भव्य राम मंदिर का निर्माण देश-विदेश के अनगिनत दानदाताओं के सहयोग से हुआ है। वर्तमान में इसके संचालन के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार केंद्र सरकार द्वारा एक ट्रस्ट का गठन किया गया है। चूंकि इसमें आम जनमानस का धन और आस्था जुड़ी है, अतः यह ट्रस्ट अब न तो व्यक्तिगत है और न ही पारिवारिक। सभी दानदाताओं ने सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र सरकार पर भरोसा जताकर अपना योगदान दिया है। हालांकि, हालिया समय में व्यवस्थागत या प्रशासनिक चूक की जो भी छिटपुट खबरें सामने आईं, उन्होंने सार्वजनिक विश्वास को आहत किया है। ऐसे में व्यवस्था की पुनः समीक्षा आवश्यक हो जाती है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे और आम जन का विश्वास सुदृढ़ हो।


"*एक आदर्श लोकतांत्रिक संरचना कैसी हो?"*

     सार्वजनिक धन से पोषित संस्थाओं (जैसे राम मंदिर) के सुचारू संचालन के लिए सबसे पहले एक व्यापक 'साधारण सभा' का गठन होना चाहिए। यदि प्रबंधकारिणी 11 सदस्यीय है, तो साधारण सभा में कम से कम 10 गुना यानी 110 सदस्य होने चाहिए। इसमें निम्नलिखित वर्गों का उचित प्रतिनिधित्व होना चाहिए:

 * संबंधित राजवंश/रियासत के वंशज

 * पारंपरिक पुजारी परिवार (जो पीढ़ियों से पूजन करते आ रहे हैं)

 * प्रमुख हिंदू संगठनों (जैसे विहिप, बजरंग दल आदि) के पदेन पदाधिकारी

 * पूर्व प्रबंध समितियों के प्रतिनिधि

 * प्रमुख दानदाता और श्रेष्ठी वर्ग

 * शंकराचार्य, रामानुजाचार्य एवं प्रतिष्ठित संत-महात्मा

 * स्थानीय प्रमुख मंदिरों के प्रबंधक या प्रतिनिधि

 * प्रशासनिक एवं वित्तीय प्रबंधन विशेषज्ञ

 * सुरक्षा विशेषज्ञ और कानूनी सलाहकार

 * धर्म, दर्शन और पूजा-पद्धति के प्रकांड विद्वान

 * भाषाई, क्षेत्रीय और अप्रवासी (NRI) प्रतिनिधि

      इसी साधारण सभा द्वारा चुनाव प्रक्रिया के माध्यम से कार्यकारिणी का चयन 3 या 5 वर्ष के लिए किया जाना चाहिए, जिसमें यह सुनिश्चित हो कि मंदिर की पारंपरिक पूजा-पद्धति और पुजारी परिवार में कोई अनुचित बदलाव न हो।


"*जन-धन का सदुपयोग और वित्तीय प्रबंधन"*

    सार्वजनिक मंदिरों में आने वाले अपार चढ़ावे, दान एवं चल-अचल सम्पत्ति का उपयोग केवल मंदिर प्रबंधन तक सीमित न रहकर व्यापक जनसेवा में होना चाहिए। इसका आदर्श वितरण इस प्रकार किया जा सकता है:

 * **20%:** मंदिर प्रबंधन और सुरक्षा।

 * **20%:** भविष्य के बड़े आयोजनों और विस्तार के लिए।

 * **10%:** आपातकालीन सुरक्षित निधि (Corpus Fund)।

 * **50%:** परमार्थ और जनसेवा। (जैसे— गौशाला, शिक्षा, चिकित्सा, वृद्धजन सेवा, और 'रामराज्य' की संस्कृति का विकास, जिसके तहत आसपास के 84 कोसी परिक्षेत्र के समग्र विकास का जिम्मा लिया जा सके)।


"*संस्थागत राजतंत्र बनाम लोकतंत्र"*

     'साधारण सभा' लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रतीक है, जबकि बंद 'ट्रस्ट व्यवस्था' एक प्रकार के राजतंत्र (Autocracy) को दर्शाती है। संस्थाओं की दीर्घकालिक सुरक्षा और निर्बाध विकास केवल लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही संभव है। राजतंत्रात्मक या पारिवारिक एकाधिकार में संस्थाएं अक्सर समय के साथ कमजोर या निष्क्रिय होकर पतन की ओर बढ़ जाती हैं।

मूल सिद्धांत यही होना चाहिए। *यदि संस्था परिवार के निजी कोष से संचालित है, तो 'ट्रस्ट व्यवस्था' उचित है; लेकिन यदि संस्था का आधार सार्वजनिक दान और जन-भागीदारी है, तो वहां अनिवार्य रूप से 'साधारण सभा' वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था ही लागू होनी चाहिए।*


डॉ.अरविन्द कुमार जैन

जयपुर- 9529530051

दि.- 22/07/2026

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