19. वेदी के पीछी रखी फोटो पूजा का औचित्य
वेदी के पीछे रखी फोटो पूजा का औचित्य
दिगम्बर जैन मन्दिरों में भगवान की वेदी के पीछे प्रायः एक फोटो रखी होती है और लगभग सभी दर्शनार्थी परिक्रमा के समय उसको नमन करते हुए अर्ध्य चढ़ाते हैं। क्या ये उचित है?
फोटो अप्रतिष्ठित होने के कारण उसको चावल चढाना, आरती करना, दर्शन कर प्रणाम करना आगमोक्त सही नहीं है, चाहे मन्दिर की फोटो हो या घर की, दुकान की हो या स्वाध्याय कक्ष या ध्यान केन्द्र की। जब अप्रतिष्ठित मूर्ति के दर्शन पूजा मान्य नहीं है तब फोटो कैसे पूजा के योग्य हो जायेगी। फोटो में भगवान का चित्र है इसलिए आदर/ सम्मान का भाव तो होता है, होना भी चाहिए परन्तु वह दर्शन- पूजा के योग्य नही है।
परिक्रमा के पीछे स्थान खाली रखा जावे यह आवश्यक नहीं है लेकिन अगर खाली है तो (कई स्थानों) वहां पर यंत्रजी, शास्त्र विराजमान कर रखा है जिसके दर्शन पूजन कर सकते हैं। संग्रहालय या गोपाचल पर्वत, अजंता, एलौरा गुफा आदि पुरातात्विक स्थानों पर खंडित मूर्तियां भी हैं और अखंडित मूर्तियां भी हैं वहां भी केवल अखंडित प्रतिमा का ही पूजन अभिषेक होता है।
हिन्दु मन्दिर और जैन मन्दिरों के सभा मण्डप और गर्भ गृह में अन्तर होता है। हिन्दु मन्दिरों में मूल भगवान का पूरा परिवार/ दरवार बैठता है जो दायें बाये आगे पीछे रहता है इन सबकी यथा योग्य पूजा होती है। जैन मन्दिर समवसरण का प्रतीक है जो सौधर्ध इन्द्र की आज्ञानुसार कुवेर निर्मित करता है। वहां द्वारपाल भी है, चंवर ढोने वाले देवगण आदि भी हैं लेकिन सभी सेवक की भूमिका में हैं। पूज्य वीतरागी जिनेन्द्र देव हैं। दोनों मन्दिरों की संरचना अपनी-अपनी संस्कृति के अनुसार बने हैं। देश- काल के अनुसार जैन मन्दिरों के बाह्य स्वरूप आपत/ संकट परिवर्तन हुए थे ताकि विधर्मियों से रक्षा की जा सके। आज भी सांगानेर जयपुर के मंदिर के मुख्य दरवाजे पर गणेशजी की मूर्ति बनी है अब इसका औचित्य नहीं है। अन्य स्थानों/ मन्दिरों की भी समीक्षा होनी चाहिए।
जैन मन्दिर जैन संस्कृति के अनुरूप बने रहें तो ही जैन धर्म की सुरक्षा होगी। वेदी परिक्रमा में रखी फोटो की पूज्यता/ अपूज्यता और वहां रखे जाने के औचित्य पर विचार आवश्यक है।
-डॉ.अरविन्द कुमार जैन
जयपुर- 9529530051
10/03/2026
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