योग्य प्रतिष्ठाचार्य के लक्षण
समीक्षार्थ-
योग्य प्रतिष्ठाचार्य के लक्षण
दिगम्बर जैन परंपरा में जिन मंदिर के निर्माण और मूर्ति स्थापना (पंचकल्याणक या वेदी प्रतिष्ठा) के समय *प्रतिष्ठाचार्य* का पद अत्यंत महत्वपूर्ण और गरिमामयी होता है। वे ही मंत्रोच्चार, विधियों और अपने तपोबल के माध्यम से पाषाण (पत्थर) में परमात्मा (वीतराग स्वरूप) की स्थापना का मार्गदर्शन करते हैं।
दिगम्बर जैन आगम ग्रंथों—जैसे आचार्य वसुनन्दि कृत *'प्रतिष्ठासार संग्रह'**, पंडित आशाधर जी कृत *'प्रतिष्ठा सारोद्धार'* और आचार्य नेमिचन्द्र कृत *'प्रतिष्ठा तिलक'*—में प्रतिष्ठाचार्य के विशिष्ट गुणों (लक्षणों) का गहराई से वर्णन किया गया है।
आचार्य वसुनन्दि ने *'प्रतिष्ठासार संग्रह'* में प्रतिष्ठाचार्य के लक्षण बताते हुए लिखा है:
"आचारादि गुणाधारो, रागद्वेषविवर्जितः। यशपातोज्झितः शांतः, साधुवर्गाग्रणीर्गणी।।**
*अशेषशास्त्रविच्चक्षुः प्रव्यक्तं लौकिक स्थितिः। गंभीरो मृदुभाषी च स सूरिः परिकीर्तितः।।"
इन ग्रंथों के आधार पर एक योग्य प्रतिष्ठाचार्य में निम्नलिखित मुख्य गुण होने चाहिए:
1. आचार-विचार की शुद्धता (चारित्रवान)
*व्रती और त्यागी- प्रतिष्ठाचार्य को सम्यक् दर्शन, ज्ञान और चारित्र का पालन करने वाला होना चाहिए। वे कम से कम एक उत्कृष्ट श्रावक (व्रती), त्यागी या ब्रह्मचारी होने चाहिए।
**श्रावकाचार का पालन-* उनका दैनिक जीवन देव दर्शन, पूजन, स्वाध्याय और संयम से युक्त होना चाहिए।
**आहार शुद्धि:** वे रात्रिभोजन त्यागी, छने जल का उपयोग करने वाले, बाजारू या अशुद्ध भोजन से दूर रहने वाले और भक्ष्याभक्ष्य का कठोरता से पालन करने वाले होने चाहिए।
2. शास्त्रों और मंत्रों के पूर्ण ज्ञाता (अशेषशास्त्रविच्चक्षुः)
**आगम और प्रतिष्ठा शास्त्र के विद्वान:** उन्हें जैन दर्शन, सिद्धांत और प्रतिष्ठा विधियों (जैसे- यन्त्र, मन्त्र, और वेदी निर्माण) का गहरा ज्ञान होना चाहिए।
**शुद्ध उच्चारण:** मंत्रों का उच्चारण एकदम शुद्ध, स्पष्ट और लयबद्ध होना चाहिए। शास्त्रों में चेतावनी दी गई है कि 'मंत्रहीन प्रतिष्ठा' आचार्य के लिए अहितकर होती है।
**लौकिक ज्ञान:** धार्मिक ज्ञान के साथ-साथ उन्हें वर्तमान लौकिक व्यवहार और समाज की स्थिति (लौकिक स्थिति) की भी अच्छी समझ होनी चाहिए।
3. स्वभाव और मानसिक गुण
**राग-द्वेष रहित (वीतरागी प्रवृत्ति):** वे राग (पक्षपात) और द्वेष (क्रोध/घृणा) से मुक्त होने चाहिए। यजमान (दानदाता) अमीर हो या गरीब, वे सभी के प्रति समभाव और निष्पक्ष रहने वाले हों।
**शांत और गंभीर:** उनका स्वभाव उग्र या चंचल नहीं, बल्कि अत्यंत शांत और गंभीर होना चाहिए ताकि अनुष्ठान के दौरान पवित्रता बनी रहे।
**मृदुभाषी:** उनकी वाणी मधुर, संयमित और दूसरों को धर्म के मार्ग पर प्रेरित करने वाली होनी चाहिए।
4.निःस्वार्थ भावना और लोभ का अभाव (यशपातोज्झितः)
**धन और यश की लालसा से दूर:** प्रतिष्ठाचार्य यश, प्रसिद्धि या केवल धन-वैभव की चाहत से मुक्त होने चाहिए।
* जो विद्वान प्रतिष्ठा को केवल धन कमाने का 'व्यवसाय' बना लेते हैं, उन्हें शास्त्रों में इस पद के लिए सर्वथा अयोग्य माना गया है। उनका मुख्य उद्देश्य धर्म प्रभावना और वीतरागता की स्थापना होना चाहिए।
5. शारीरिक एवं बाह्य शुद्धता
*स्वस्थ शरीर और मन- प्रतिष्ठाचार्य किसी गंभीर शारीरिक व्याधि (बीमारी) या मानसिक तनाव से ग्रस्त नहीं होने चाहिए, ताकि वे कई दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान को बिना किसी बाधा के संपन्न करा सकें।
*वेशभूषा- अनुष्ठान के दौरान वे पूर्ण संयम से रहें और शुद्ध, धुले हुए नवीन वस्त्र (जैसे- धोती-दुपट्टा) ही धारण करें।
सूरिमंत्र प्रदाता- अगर निकट में निर्ग्रन्थ साधु 28 मूल गुणों का निरतिचार पालन करने वाले एवं आगमनिष्ठ हों तो मूर्तियों पर उनसे भी सूरिमंत्र प्रतिष्ठाचार्य दिला सकते हैं।
निष्कर्ष-
शास्त्रों में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि *"द्रव्यहीन प्रतिष्ठा यजमान का, मंत्रहीन प्रतिष्ठा आचार्य का और लक्षणहीन (बिना गुणों वाले आचार्य द्वारा की गई) प्रतिष्ठा लक्ष्मी का नाश करती है।"* इसलिए एक प्रतिष्ठाचार्य का जीवन मात्र कर्मकांडी नहीं, बल्कि सादगी, वैराग्य, आगम ज्ञान और सदाचार की जीती-जागती मिसाल होना चाहिए।
-डॉ.अरविन्द कुमार जैन
जयपुर- 95295 30051
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