21. दिगम्बर जैन समाज- चुनौति एवं समाधान
*दिगम्बर जैन समाज- चुनौति एवं समाधान*
तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म कल्याणक चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को होता है यह तिथि अलग-अलग कलेण्डर में 30 एवं 31 मार्च को दो दिनांकों में अलग-अलग थी। केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने अपने-अपने कलेण्डरों में 31 मार्च का अवकाश घोषित किया था। दिगम्बर जैन समाज ने उदयतिथि के अनुसार चैत्र शुक्ल त्रयोदशी दि.- 30 मार्च को मान कर जन्मकल्याणक मनाया। दिगम्बर जैन समाज के आग्रह पर कई राज्यों में 30 मार्च का अवकाश घोषित किया, कई राज्यों ने कलेक्टर्स की पावर देकर विकल्प दे दिया। केन्द्र सरकार ने 31 मार्च का अवकाश यथावत् रहा। दिगम्बर जैन समाज में इस बात का रोष और असन्तोष है कि 30 मार्च को अवकाश ना होने के कारण विद्यार्थियों को स्कूल और कर्मचारियों को आफिस जाना पड़ा जिस बजह से जन्म कल्याणक नहीं मना पाये या अवकाश लेना पड़ा और दूसरे दिन अवकाश होने के कारण खाली बैठे रहे। इस सबके लिए हम सरकारों की गलती मानकर कोसते रहे। क्या वाकई में सरकारों की गलती थी या अन्य और कोई बजह भी हो सकती है? इस पर भी विचार करना आवश्यक है-
1.दिगम्बर जैन समाज की राष्ट्रीय संस्थाओं की एक समन्वय समिति है- वही एक मात्र संस्था दिगम्बर समाज का प्रतिनिधित्व करती है। इसलिए समन्वय समिति की जिम्मेदारी बनती है कि वह दिगम्बरत्व के संरक्षण एवं विकास की योजना बनावे। समन्यव समिति का कर्तव्य है कि वह दिगम्बर समाज के समस्त पंथों/ संस्थाओं/ आचार्यों में समन्वय कर अनेक कार्यों के लिए उपसमिति बनावे।
2.दिगम्बर, श्वेताम्बर, श्रीमद् राजचन्द आदि समाज में समन्वय का कार्य होना चाहिए। इसके लिए समन्वय समिति आगे आकर पहल करे। क्योंकि दोनों पंथों में कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिसकी बजह से टकराव बना रहता है तथा इस फूट का लाभ सरकार और तीसरा पक्ष उठाता है। इसलिए ये समन्वय भी बहुत आवश्यक है।
3.भारतीय संस्कृति के प्रमुख पांच स्तंभ हैं- वैदिक (हिन्दू), जैन, बौद्ध, सिख एवं आदिवासी। इनके अस्तित्व को स्वीकारते हुए एवं सम्मान करते हुए भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं विकास के लिए समन्वय समिति बनने की भी सकल जैन समाज को करनी चाहिए। जिसमें वर्ण, जाति, भाषा के मानवीय और संवैधानिक आधार खोजने होंगे समन्वय के, तभी देश- विदेश में भारत अहिंसा का सन्देश दे सकता है।
4.आज विदेशों में भारतीय मूल निवासी शिक्षा, रोजगार आदि के लिए स्थाई / अस्थाई रूप से वसे हुए हैं जो वहां पर भारतीय संस्कृति बनाये हुए हैं। सत्य, अहिंसा, योग, क्षमा आदि भारतीय मानक तत्वों से प्रभावित होकर मूल विदेशी भी भारतीय संस्कृति को अपना रहे हैं और इसके लिए भारत आकर सीखते हैं। इसके अलावा कनिष्ठ, अशोक, खारवेल , चन्द्र गुप्त आदि सम्राटों ने एवं भरत आदि चक्रवती, अर्द्ध चक्रवतियों ने भरत क्षेत्र के छह खंडों/ तीन खंडों पर राज्य किया है। इन पर का इतिहास एवं पुरातत्व भी कहीं कहीं आज भी विद्यमान है और खोजे भी जा सकते हैं- इनके आधार पर वैश्विक भारतीय संस्कृति (वैदिक/ हिन्दू, जैन , बौद्ध, सिख, आदिवासी) का संरक्षण और विकास किया जा सकता है।
5.दिगम्बर जैन समाज को इन सबमें इसलिए पहल करना चाहिए क्योंकि दिगम्बर जैन दर्शन एवं संस्कृति प्राचीनतम है जो प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव से प्रारंभ होती है और जिसका पौराणिक साहित्य इसकी अनादि अनन्त , शाश्वत, सनातनता का साक्षी एवं साक्षृय है।
इस दिशा में काफी लोग/ संस्थायें काम भी कर रहीं होंगी तो उन सबका एक समन्वय रूप सामने आना चाहिए। कम से कम यह सब वैचारिक मंच पर तो अवश्य आना चाहिए इसके लिए जैन राजनेता, जैनाचार्य, विद्वानों का आगे आना चाहिए।
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