षट्खंडागम की टीकायें

 श्रुतावतरण- श्रुत पंचमी

*षटखंडागम और टीकायें*

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         -डॉ.अरविन्द कुमार जैन

    षट्खण्डागम सबसे प्राचीन, प्रामाणिक और श्रद्धेय आगम ग्रंथ माना जाता है। प्रथम शताब्दी में आचार्य पुष्पदंत और आचार्य भूतबलि द्वारा प्राकृत भाषा के सूत्रों में रचे गए इस ग्रंथ के गूढ़ रहस्यों को स्पष्ट करने के लिए बाद के आचार्यों ने इस पर विस्तृत टीकाएँ (व्याख्याएँ) लिखीं।

आचार्य इन्द्रनन्दि के ग्रंथ *'श्रुतावतार'* के अनुसार, षट्खण्डागम पर प्राचीन काल में मुख्य रूप से छह टीकाएँ, जिन्हें 'षट्टीका' कहा जाता है लिखी गई थीं।

   इन टीकाओं, उनके टीकाकारों और समय का प्रामाणिक विवरण इस प्रकार है:

*षट्खण्डागम की 6 प्राचीन टीकाएँ*


*टीका, टीकाकार, समय*

*परिकर्म-* आचार्य कुन्दकुन्द लगभग प्रथम शताब्दी

2.पद्धति*-आचार्य शामकुण्ड | लगभग तीसरी शताब्दी

3.पंजिका- (तुम्बुलूर की टीका) | आचार्य तुम्बुलूर | लगभग चौथी शताब्दी

4.समन्तभद्र की टीका- आचार्य समन्तभद्र | दूसरी शताब्दी

5.बप्पदेव की टीका। आचार्य बप्पदेव | लगभग छठी शताब्दी

6.धवला- आचार्य वीरसेन स्वामी | 9वीं शताब्दी (पूर्णता: 8 अक्टूबर 816 ई. / शक संवत 738) |


*प्राचीन टीकाओं की वर्तमान स्थिति*

 *अनुपलब्ध टीकाएँ:* 

  काल के प्रभाव से प्रथम पाँच टीकाएँ (परिकर्म, पद्धति, पंजिका, समन्तभद्र व बप्पदेव की टीका) आज पूर्ण रूप से **अनुपलब्ध (लुप्त)* हैं। यद्यपि 'धवला' टीका में आचार्य वीरसेन ने इन पूर्ववर्ती टीकाओं के अनेक उद्धरणों का सन्दर्भ दिया है, जिससे इनके अस्तित्व की पुष्टि होती है।

 **एकमात्र उपलब्ध प्राचीन टीका - धवला:** वर्तमान में षट्खण्डागम पर केवल छठी टीका धवला ही उपलब्ध है। यह प्राकृत और संस्कृत मिश्रित भाषा में लिखी गई है और इसका प्रमाण 72,000 श्लोकों के बराबर है। यह इतनी विशाल और पवित्र मानी जाती है कि आज षट्खण्डागम और धवला को एक-दूसरे का पर्याय मान लिया गया है। जिस दिन षटखंडागम ग्रंथ पूर्ण हुआ, उस दिन को जैन धर्म में श्रुत पंचमी के रूप में मनाया जाता है।

    आधुनिक काल की टीका

यद्यपि प्राचीन काल की 6 टीकाओं का ही मुख्य ऐतिहासिक सन्दर्भ मिलता है, किन्तु आधुनिक युग में भी षट्खण्डागम को अधिक सुगम बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण संस्कृत टीका लिखी गई है:

 **सिद्धान्तचिन्तामणि टीका:* बीसवीं शताब्दी के अंत में (वर्ष 1997 में आरम्भ), आधुनिक युग की विदुषी **गणिनी प्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी** ने 'धवला' को आधार बनाकर षट्खण्डागम पर *सिद्धान्तचिन्तामणि* नामक विस्तृत संस्कृत टीका रची है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह एक ऐतिहासिक साहित्यिक योगदान है।

     भगवान् महावीर के मूल शसंघ नायक, दिगम्बर शिरोमणि आचार्य कुन्दकुन्द की षटखंडागम पर प्रथम टीका मिलती है इससे जाना जाता है कि आचार्य कुन्दकुन्द प्रथम एवं द्वितीय श्रुत स्कन्ध की लिखित परम्परा से विज्ञ थे। चूंकि भगवान् महावीर के शिष्य पट्टपरम्परा के 32 वें पट्टाचार्य होने के नाते उन्हें पट्ट परम्परा से प्राप्त मौखिक - लिखित श्रुत एवं आचार परम्परा का पूरा ज्ञान था। उनके ग्रंथो में सैद्धांतिक एवं आचारगत समस्त शिथिलताओं को द्रढता के साथ निर्मूल किया है। कषाय पाहुड और षटखंडागम के बाद आचार्य कुन्दकुन्द का विपुल और प्रामाणिक ग्रंथ साहित्य ही भावी दिगम्बर परम्परा के संचालन में मूल रहे हैं। 

।। जिनवाणी माता की जय ।।

-डॉ.अरविन्दकुमार जैन

जयपुर- 9529530051

21/06/2026

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