20. केशलुंचन साधु का मूलगुण

 केशलुंचन-साधु का मूलगुण

     (उद्देश्य एवं क्रियान्वयन) 

   निर्ग्रन्थता का एक मूल गुण केशलुंचन। केशलुंचन अर्थात् हाथों से सिर, मूंछ, दाढ़ी के बालों को उपाडना। अस्नानवृति होने से बालों में होने वाले जीवोत्पत्ति से बचने के लिए केशलुंचन किया जाता है। इसमें अयाचना/ स्वाभिमान की रक्षा होती है। वैराग्य का श्रृंगार केशलुंचन है। ये आरोप नितान्त  गलत हैं कि जैन साधु द्वारा केशों को श्रृंगारना या फैंचीकट करवाना, लुंचन के बाद ब्लेड आदि से साफ करना, छाती आदि के बाल साफ करवाना आदि क्योंकि ये सब केशलुंचन मूलगुण को घातते हैं। एक बाल भी शरीर श्रृंगार की द्रष्टि से निकाला या बचाया जाता है तो वह केशलुंचन क्रिया के विपरीत है। 28 में से एक भी मूलगुण घात होने से मुनिपना नहीं बनता है। इसलिए दिगम्बर जैन साधु आगमोक्त विधि से समय सीमा में केशलुंचन करते हैं। साधु के केशलुंचन क्रिया देखने से लोगों में वैराग्य भाव जगता है। केशलुंच साधु का सतत् परीक्षा- धैर्य, समता, भेदज्ञान का उत्कृष्ट अवसर होता है। केशलुंच मूलगुणधारी निर्ग्रन्थ साधुओं को त्रियोग नमोस्तु।🙏🙏🙏

*क्या वर्तमान में सभी साधुओं की केशलुंचन क्रिया आगमोक्त है?* इसको अगर जानना और देखना है तो किसी भी 5 साधुओं की केशलुंचन प्रक्रिया स्वयं देखना चाहिए। बिना देखे समझे आरोप लगाना गलत है।

-डॉ.अरविन्द कुमार जैन

जयपुर - 9529530051

दि.- 12/03/2026

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