भारतीय इतिहास के अनसुलझे रहस्य -मन्दिर, मूर्ति और पुरातात्त्विक सर्वेक्षण
*"भारतीय इतिहास के अनसुलझे रहस्य- मन्दिर, मूर्तियाँ और पुरातात्विक सर्वेक्षण"*
भारत का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह धर्म, दर्शन और वास्तुकला के क्रमिक विकास और संघर्ष का भी जीवंत दस्तावेज है। वर्तमान समय में जब भी प्राचीन भारतीय मन्दिरों और मूर्तियों के उद्गम की बात आती है, तो एक बड़ा विमर्श उभर कर सामने आता है। यह विमर्श इस परिकल्पना पर आधारित है कि यदि भारतीय मन्दिरों और मूर्तियों का निष्पक्ष पुरातात्विक सर्वेक्षण हो, तो अनेक वर्तमान हिन्दू (ब्राह्मण) मन्दिर मूल रूप से जैन या बौद्ध सिद्ध हो सकते हैं।
इस तर्क के पीछे एक ठोस ऐतिहासिक आधार है, जिसे समझने के लिए हमें वैदिक और श्रमण (जैन-बौद्ध) परम्पराओं के मूल स्वरूप को समझना होगा।
*वैदिक धर्म: यज्ञ प्रधान परम्परा*-
ऐतिहासिक और साहित्यिक साक्ष्य (जैसे वेद) स्पष्ट करते हैं कि प्रारम्भिक आर्य या वैदिक धर्म पूरी तरह से **यज्ञ प्रधान* था।
* ऋग्वैदिक काल में ईश्वर की आराधना प्रकृति के तत्वों (अग्नि, इन्द्र, वरुण, वायु) के रूप में की जाती थी।
* इसके लिए किसी मन्दिर (आयतन) या मूर्ति की आवश्यकता नहीं थी। खुले आसमान के नीचे यज्ञ वेदियों का निर्माण होता था और आहुतियों के माध्यम से देवताओं का आह्वान किया जाता था।
* ब्राह्मण ग्रन्थों और उपनिषदों तक में मूर्ति पूजा का कोई स्पष्ट या संस्थागत उल्लेख नहीं मिलता है।
*श्रमण परम्परा: मूर्ति पूजा और मन्दिरों का उद्गम*-
दूसरी ओर, भारत में मूर्ति पूजा और मन्दिर निर्माण (चैत्य और विहार) का वास्तविक श्रेय मुख्य रूप से **श्रमण परम्पराओं (जैन और बौद्ध धर्म)** तथा स्थानीय यक्ष-नाग सम्प्रदायों को जाता है।
*बौद्ध धर्म-* महायान शाखा के उदय के साथ ही भगवान बुद्ध की मूर्तियों (गांधार और मथुरा कला शैली) का निर्माण बड़े पैमाने पर शुरू हुआ। उनके अवशेषों पर स्तूप और चैत्य बनाए गए।
*जैन धर्म-* जैन धर्म में तीर्थंकरों की वन्दना और उनकी मूर्तियों के निर्माण की परम्परा बहुत प्राचीन है। मौर्य काल और उसके बाद के मथुरा के पुरातात्विक साक्ष्य (जैसे कंकाली टीला) यह सिद्ध करते हैं कि जैन स्तूप और मूर्तियाँ प्राचीनतम हैं।
जब जैन और बौद्ध धर्म ने कला और वास्तुकला के माध्यम से जनमानस में गहरी पैठ बना ली, तब ब्राह्मण धर्म (जो बाद में पौराणिक हिन्दू धर्म के रूप में विकसित हुआ) ने भी इस प्रभाव को स्वीकार किया। पौराणिक काल (विशेषकर गुप्त काल) में विष्णु, शिव और देवी की मूर्तियों की स्थापना और भव्य मन्दिरों का निर्माण शुरू हुआ।
*ऐतिहासिक संक्रमण और मन्दिरों का रूपान्तरण*-
इतिहास और पुरातत्व के विद्वान यह मानते हैं कि जैसे-जैसे भारत में बौद्ध धर्म का पतन हुआ और जैन धर्म का प्रभाव कुछ विशिष्ट क्षेत्रों तक सीमित हुआ, उनके कई पूजा स्थलों, विहारों और गुफाओं पर ब्राह्मण धर्म का प्रभाव स्थापित हो गया।
*आत्मीकरण-* इसे सीधे तौर पर 'कब्जा' कहने के बजाय इतिहासकार इसे 'धार्मिक समन्वय या रूपान्तरण' के रूप में देखते हैं। कई स्थानों पर बुद्ध या तीर्थंकरों की मूर्तियों को शिव, विष्णु या स्थानीय देवताओं के रूप में पूजना शुरू कर दिया गया।
*उदाहरण- पुरी के जगन्नाथ मन्दिर, तिरुपति बालाजी, और दक्षिण भारत के कई शिव और विष्णु मन्दिरों के बारे में कई इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों (जैसे स्वामी विवेकानन्द ने भी पुरी के मन्दिर के बौद्ध उद्गम की ओर इशारा किया था) का मानना है कि वे मूलतः बौद्ध या जैन केन्द्र थे। अजन्ता और एलोरा की गुफाओं में भी तीनों धर्मों के सह-अस्तित्व और क्रमिक बदलाव को स्पष्ट देखा जा सकता है।
*पुरातात्विक सर्वेक्षण की भूमिका और सम्भावित परिणाम-*
यदि आज के समय में उन्नत पुरातात्विक तकनीकों (जैसे स्ट्रेटिग्राफी, कार्बन डेटिंग और ग्राउंड-पेनेट्रेटिंग रडार) का उपयोग करके व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाए, तो क्या परिणाम होंगे?
1. **ऐतिहासिक परतों का उद्घाटन:** लगभग हर प्राचीन मन्दिर के नीचे किसी न किसी प्राचीन संरचना के अवशेष मिल सकते हैं। यह बहुत सम्भव है कि कई प्रसिद्ध ब्राह्मण तीर्थस्थलों की सबसे निचली पुरातात्विक परतें (Lowest strata) जैन या बौद्ध चैत्यों की निकलें।
2. "ब्राह्मण आयतन विहीन हो सकते हैं" - इस तर्क की समीक्षा-
यह सत्य है कि सर्वेक्षण से कई मन्दिरों के मूल रूप से बौद्ध या जैन होने की पुष्टि हो सकती है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि ब्राह्मण धर्म का अपना कोई वास्तुकला इतिहास नहीं है। गुप्त काल के बाद पल्लव, चोल, और चालुक्य राजाओं ने स्वतंत्र रूप से विशाल हिन्दू मन्दिरों का निर्माण भी करवाया। लेकिन यह अवश्य सिद्ध होगा कि मन्दिर निर्माण की 'प्रेरणा' और कई 'मूल स्थान' श्रमण परम्परा से ग्रहित किए गए थे।
3. **मिथकों का खण्डन:** यह सर्वेक्षण भारतीय इतिहास के कई ऐसे रहस्य उद्घाटित कर सकता है, जो वर्तमान धार्मिक अतिवाद को चुनौती देंगे और यह स्थापित करेंगे कि भारतीय संस्कृति एक 'शुद्ध' या 'एकल' परम्परा न होकर, विभिन्न धर्मों के विचारों, संघर्षों और समन्वय की उपज है।
*निष्कर्ष-
प्राचीन भारत का इतिहास कोई स्थिर तालाब नहीं, बल्कि एक बहती हुई नदी है जिसने अपने रास्ते में आने वाली हर धारा को खुद में समाहित किया है। वैदिक यज्ञों से शुरू हुई यात्रा जब मूर्ति और मन्दिरों तक पहुँची, तो उसमें जैन और बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा योगदान था। एक वैज्ञानिक और निष्पक्ष पुरातात्विक सर्वेक्षण निश्चय ही हमारी ऐतिहासिक समझ को बदल सकता है और हमें यह स्वीकार करने पर विवश कर सकता है कि जिन मन्दिरों को आज हम किसी एक धर्म की बपौती मानते हैं, वे वास्तव में भारत की मिली-जुली और क्रमिक सांस्कृतिक विरासत का परिणाम हैं।
भारत में ऐसे कई प्रसिद्ध और प्राचीन मन्दिर हैं, जिनके बारे में इतिहासकारों, पुरातात्विक साक्ष्यों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि वे मूल रूप से बौद्ध या जैन उपासना स्थल थे। इन दावों का आधार मूर्तियों की बनावट, मन्दिरों का स्थापत्य, पूजा पद्धतियाँ और स्थानीय लोक परम्पराएँ हैं।
विद्वत् जनों और पुरातत्वविदों द्वारा प्रस्तुत किए गए कुछ प्रमुख ऐतिहासिक उदाहरण और साक्ष्य इस प्रकार हैं-
*1. बद्रीनाथ मन्दिर (उत्तराखण्ड)*-
बद्रीनाथ को हिन्दुओं के सबसे पवित्र चार धामों में से एक माना जाता है, लेकिन इसकी मुख्य मूर्ति और स्थापत्य को लेकर कई ऐतिहासिक दावे हैं।
*पुरातात्विक और कलात्मक साक्ष्य-*
बद्रीविशाल की मुख्य काले पत्थर की मूर्ति पद्मासन (ध्यान मुद्रा) में बैठी हुई है। पारम्परिक रूप से भगवान् विष्णु की मूर्तियाँ या तो खड़ी मुद्रा (स्थानक) में होती हैं या शेषनाग पर लेटी हुई (शयन मुद्रा) में। पद्मासन में ध्यान मग्न मूर्ति मुख्य रूप से भगवान् बुद्ध या जैन तीर्थंकरों की वास्तुकला शैली है।
*ऐतिहासिक आधार- स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने इस मूर्ति को अलकनंदा नदी (नारद कुण्ड) से निकालकर मन्दिर में पुनर्स्थापित किया था। इतिहासकार इसे इस रूप में देखते हैं कि बौद्ध धर्म के पतन के बाद, बौद्ध मूर्तियों को नदी में फेंक दिया गया होगा और बाद में ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान के दौरान उन्हें विष्णु के अवतार के रूप में स्वीकार कर लिया गया।
*2. जगन्नाथ मन्दिर (पुरी, ओडिशा)*
पुरी का जगन्नाथ मन्दिर अपनी विशिष्ट काष्ठ (लकड़ी) मूर्तियों और रथ यात्रा के लिए विश्व प्रसिद्ध है। स्वामी विवेकानन्द और बंकिम चंद्र चटर्जी जैसे विचारकों ने भी इसके बौद्ध मूल की ओर इशारा किया था।
**त्रिरत्न का प्रतीक- जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों का स्वरूप पारम्परिक हिन्दू मूर्तिकला से बिल्कुल अलग है। विद्वत् समाज का एक बड़ा वर्ग मानता है कि ये तीनों मूर्तियाँ बौद्ध धर्म के 'त्रिरत्न' (बुद्ध, धम्म और संघ) या जैन धर्म के 'सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चरित्र' का मानवीकरण हैं।
*रथ यात्रा का साक्ष्य-*
5वीं शताब्दी में भारत आए चीनी यात्री फाह्यान (Faxian) ने खोतान (मध्य एशिया) में बिल्कुल ऐसी ही एक बौद्ध रथ यात्रा का वर्णन किया है, जिसमें बुद्ध की मूर्ति को रथ पर निकाला जाता था।
*जाति-भेद का अभाव- जगन्नाथ मन्दिर में महाप्रसाद ग्रहण करते समय जाति-पांति का कोई भेद नहीं माना जाता। यह समानता की भावना बौद्ध और जैन परम्पराओं का स्पष्ट प्रभाव मानी जाती है।
*3. तिरुपति वेंकटेश्वर (बालाजी) मन्दिर (आन्ध्र प्रदेश)-*
दक्षिण भारत के इस सबसे प्रसिद्ध मन्दिर के मूल स्वरूप को लेकर इतिहास और पुरातत्व में लम्बी बहस रही है।
*मूर्ति की बनावट- मुख्य गर्भगृह में स्थित वेंकटेश्वर स्वामी की मूल पाषाण मूर्ति के हाथों में विष्णु के पारम्परिक आयुध (शंख और चक्र) खुदे हुए नहीं हैं। ये आयुध धातु के बने हैं जिन्हें मूर्ति को अलग से पहनाया जाता है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार, बिना आयुध की यह मूल मूर्ति किसी जैन तीर्थंकर (संभवतः नेमिनाथ) की हो सकती है।
*केश दान (मुंडन) परम्परा*- तिरुपति में बाल दान करने की बहुत बड़ी प्रथा है। वैदिक कर्मकाण्डों में मुंडन मुख्य रूप से शोक या प्रायश्चित का प्रतीक है, जबकि मुंडन करवाकर आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत करना (प्रव्रज्या) पूरी तरह से बौद्ध भिक्षुओं और जैन मुनियों की परम्परा रही है।
*4. सबरीमाला मन्दिर (केरल)*-
भगवान् अयप्पा का यह मन्दिर घने जंगलों के बीच पहाड़ी पर स्थित है।
*उद्घोष और मुद्रा- मन्दिर में भगवान् अयप्पा की मूर्ति 'चिनमुद्रा' (योग और ध्यान की मुद्रा) में है। यहाँ के भक्तों का मुख्य उद्घोष "स्वामी शरणम् अयप्पा" सीधे तौर पर बौद्ध मन्त्र "बुद्धं शरणं गच्छामि" (मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ) का रूपान्तरण प्रतीत होता है।
*तीर्थयात्रा के नियम- सबरीमाला यात्रा से पहले 41 दिन का कठोर व्रत (मण्डलम), काले कपड़े पहनना और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना—ये सभी नियम बौद्ध विहारों में भिक्षुओं द्वारा अपनाए जाने वाले अनुशासन के बहुत करीब हैं। पहाड़ियों और गुफाओं में एकान्त वास श्रमण परम्परा की ही पहचान थी।
*5. कांचीपुरम के कामाक्षी और अन्य मन्दिर (तमिलनाडु)*-
कांचीपुरम कभी दक्षिण भारत में बौद्ध और जैन धर्म का एक बहुत बड़ा केन्द्र था।
*जैन मूर्तियों की प्राप्ति- कांचीपुरम के कई वर्तमान हिन्दू मन्दिरों के परिसरों से खण्डित जैन मूर्तियाँ और शिलालेख मिले हैं। कामाक्षी अम्मन मन्दिर के बारे में पुरातात्विक साक्ष्य दर्शाते हैं कि यह मूल रूप से बौद्ध देवी तारा या जैन देवी का मन्दिर था, जिसे बाद में शाक्त परम्परा (देवी पूजा) में समाहित कर लिया गया।
*इतिहास का निष्कर्ष- यह रूपान्तरण अधिकांशतः किसी हिंसक टकराव का परिणाम नहीं था, बल्कि यह एक क्रमिक 'धार्मिक आत्मीकरण था। जैसे-जैसे जैन और बौद्ध धर्म का जन-प्रभाव कम हुआ, उनके पवित्र स्थलों, मूर्तियों और परम्पराओं को पौराणिक हिन्दू धर्म ने अपने प्रतीकों और मिथकों के साथ अपना लिया।
शोध की दिशा-
*भारत एवं विश्व में मन्दिर एवं मूर्ति का निर्माण, पूजा एवं कला का वैशिष्ट्य - स्वतंत्र विषय है जो इतिहास एवं पुरातत्व की गहन शोधात्मक द्रष्टि रखता है।*
*डॉ.अरविन्द कुमार जैन
जयपुर- 9529530051
दि.- 06/07/2026
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