भोजशाला प्राचीन जैन मन्दिर

 *भोजशाला प्राचीन जैन मन्दिर*

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       मध्य प्रदेश के धार में स्थित 11वीं शताब्दी का ऐतिहासिक भोजशाला परिसर मुख्य रूप से हिंदू (सरस्वती मंदिर) और मुस्लिम (कमाल मौला मस्जिद) दावों के कारण चर्चा में रहता है। हालांकि, पुरातात्विक साक्ष्यों और ऐतिहासिक अध्ययनों के आधार पर जैन समुदाय का भी यह दृढ़ दावा है कि यह स्थल मूल रूप से एक प्राचीन जैन मंदिर और शिक्षण केंद्र था।

   यहां इसके जैन मन्दिर होने के प्रमुख साक्ष्य और मान्यताएं दी गई हैं:


*पुरातात्विक और ऐतिहासिक साक्ष्य*-


 *वाग्देवी बनाम अम्बिका यक्षिणी की मूर्ति-* 1875 में ब्रिटिश काल के दौरान परिसर के निकट से एक खंडित मूर्ति प्राप्त हुई थी, जो वर्तमान में लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी है। इसे आमतौर पर 'वाग्देवी' (देवी सरस्वती) की मूर्ति माना जाता है। लेकिन कई इतिहासकारों और जैन विद्वानों का मजबूत तर्क है कि यह वास्तव में *अम्बिका यक्षिणी* की मूर्ति है, जो 22 वें जैन तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ की संरक्षक देवी (शासन देवी) हैं।


 *एएसआई (ASI) उत्खनन (2024)-* हाल ही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा किए गए वैज्ञानिक सर्वे में परिसर के भीतर से जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां और जैन धर्म से जुड़ी विशिष्ट नक्काशी (आइकनोग्राफी) प्राप्त हुई है, जो यहां पहले से एक जैन ढांचे की मौजूदगी का सीधा संकेत देती है।


 *शिलालेखों में जैन शाखाओं का उल्लेख-* इस स्थल की दीवारों और फर्श पर मिले प्राचीन शिलालेखों के अध्ययन से पता चलता है कि इनमें 'वररुचि' नामक एक व्यक्ति का उल्लेख है। यह व्यक्ति शिलालेख में स्वयं को 'चंद्रनागरी' और 'विद्याधरी' धर्म का अनुयायी बताता है। प्राचीन काल में ये दोनों जैन धर्म की बहुत ही प्रतिष्ठित शाखाएं (गच्छ) हुआ करती थीं।


 *स्थापत्य और नक्काशी की समानता-* भोजशाला के मौजूदा खंभों और वहां मिले मंदिर के अवशेषों की वास्तुकला राजस्थान के प्रसिद्ध दिलवाड़ा जैन मंदिरों की निर्माण शैली से काफी समानता रखती है। खंभों पर उकेरी गई ज्यामितीय आकृतियां विशिष्ट जैन वास्तुकला की ओर इशारा करती हैं।


*जैन समुदाय की मान्यताएं*-

 *प्राचीन गुरुकुल और दर्शन केंद्र-*      जैन समाज की यह मान्यता है कि परमार राजवंश के दौरान यह स्थल केवल एक उपासना स्थल नहीं था, बल्कि जैन दर्शन, शिक्षा-दीक्षा और साहित्य का एक बहुत बड़ा गुरुकुल (विश्वविद्यालय) था।


 *परमार राजाओं का जैन विद्वानों को संरक्षण-* ऐतिहासिक तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि राजा भोज और अन्य परमार शासक कला और साहित्य के बड़े संरक्षक थे और उनके राज्य में सभी धर्मों का सम्मान था। उनके दरबार में महाकवि धनपाल (जिन्होंने 'तिलकमंजरी' की रचना की) जैसे कई दिग्गज जैन विद्वान मौजूद थे। माना जाता है कि इन्हीं जैन आचार्यों और विद्वानों के पठन-पाठन के लिए इस विशाल केंद्र का उपयोग होता था।

   कुल मिलाकर, हालिया पुरातात्विक खोजों और शिलालेखों के सूक्ष्म अध्ययन ने भोजशाला के इतिहास में जैन धर्म के गहरे प्रभाव और इसके एक महत्वपूर्ण जैन केंद्र होने के दावों को एक ठोस ऐतिहासिक आधार प्रदान किया है।

    इस संबंध में मीनू जैन का 15 मई 2026 को आये सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद विश्लेषण करने वाला एक वीडियो भी सुनना चाहिए।


डॉ. अरविन्द कुमार जैन 

    9529530051

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