जैन धर्म दशा और दिशा

 जैन धर्म : दशा और दिशा

    जैन धर्म भारत की प्राचीनतम आध्यात्मिक परम्पराओं में से एक है। अहिंसा, अनेकान्त, अपरिग्रह तथा आत्मकल्याण इसका मूल आधार हैं। वर्तमान समय में जैन समाज शिक्षा, व्यापार, उद्योग, चिकित्सा तथा सामाजिक सेवा के क्षेत्र में अग्रणी है, किन्तु धार्मिक दृष्टि से अनेक चुनौतियाँ भी सामने हैं। इसलिए जैन धर्म की वर्तमान दशा (स्थिति) और भावी दिशा (मार्ग) पर गंभीर चिंतन आवश्यक है।

जैन धर्म -वर्तमान दशा

1. जनसंख्या में कमी-

     जैन समाज की जनसंख्या अपेक्षाकृत कम है और जन्मदर में निरन्तर कमी देखी जा रही है। इससे समाज के अस्तित्व और विस्तार को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं।

2. धार्मिक ज्ञान का अभाव-

   यद्यपि जैन समाज शिक्षित है, फिर भी अनेक युवाओं में जैन सिद्धान्तों, आगमों और आचार्यों के साहित्य का पर्याप्त अध्ययन नहीं हो रहा है।

3. कर्मकाण्ड की बढ़ती प्रवृत्ति-

धर्म के मूल तत्व—सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र—की अपेक्षा बाह्य आडम्बरों और कर्मकाण्डों पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा है।

4. युवा पीढ़ी का दूराव-

    आधुनिक जीवनशैली, डिजिटल आकर्षण और व्यस्तता के कारण युवाओं का धार्मिक गतिविधियों से जुड़ाव कम होता दिखाई देता है।

5. सम्प्रदायगत विभाजन

    दिगम्बर, श्वेताम्बर तथा उनके विभिन्न उपसम्प्रदायों के बीच मतभेद कभी-कभी व्यापक जैन एकता में बाधा उत्पन्न करते हैं।

6.सकारात्मक पक्ष-

जैन समाज आर्थिक रूप से सशक्त है।

शिक्षा और व्यवसाय में अग्रणी है।

देश-विदेश में जैन संस्थाओं का विस्तार हुआ है।

अहिंसा और शाकाहार के सिद्धान्त विश्व स्तर पर सम्मान प्राप्त कर रहे हैं।

जैन धर्म की दिशा-

1.रत्नत्रय केन्द्रित धर्म साधना-

     धर्म का केन्द्र सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र होना चाहिए। मोक्षमार्ग की इस मूल भावना को पुनः स्थापित करना आवश्यक है।

2. जिनवाणी का व्यापक अध्ययन-

     समयसार, प्रवचनसार, नियमसार, तत्त्वार्थसूत्र, गोम्मटसार आदि ग्रन्थों का नियमित स्वाध्याय बढ़ाना होगा। श्रुतज्ञान की रक्षा ही धर्म की रक्षा है।

3.युवाओं को जोड़ना-

    धार्मिक संस्कार शिविर, अध्ययन वर्ग, ऑनलाइन पाठ्यक्रम और आधुनिक तकनीक के माध्यम से युवाओं को जैन सिद्धान्तों से जोड़ना होगा।

4.अहिंसा का वैश्विक प्रसार-

    आज विश्व हिंसा, युद्ध और पर्यावरण संकट से जूझ रहा है। जैन धर्म की अहिंसा और अपरिग्रह की शिक्षाएँ मानवता को नई दिशा दे सकती हैं।

5.सम्प्रदाय से ऊपर सिद्धान्त

     सम्प्रदायगत आग्रहों से ऊपर उठकर जैन समाज को जिनेन्द्र भगवान, जिनवाणी और मोक्षमार्ग की मूल भावना पर एकजुट होना चाहिए।

*6.चरित्र निर्माण पर बल*

    धर्म का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि जीवन में संयम, सत्य, करुणा और आत्मानुशासन का विकास है।

*7.डिजिटल युग में जिनवाणी*

     जैन साहित्य का डिजिटलीकरण, ऑनलाइन पुस्तकालय, मोबाइल ऐप और सोशल मीडिया के माध्यम से धर्म का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए।

     जैन धर्म की वास्तविक शक्ति उसके अनुयायियों की संख्या में नहीं, बल्कि उसके सिद्धान्तों की महानता में है। यदि जैन समाज जिनेन्द्र भगवान द्वारा प्रतिपादित रत्नत्रय, अहिंसा, अनेकान्त और अपरिग्रह के मार्ग पर दृढ़तापूर्वक चले तथा नई पीढ़ी को जिनवाणी से जोड़े, तो जैन धर्म की दिशा उज्ज्वल और भविष्य अत्यन्त गौरवशाली होगा।


"धर्म न मन्दिरों में है, न बाह्य आडम्बरों में; धर्म आत्मा की शुद्धि और रत्नत्रय की साधना में है।"

डॉ.अरविन्द कुमार जैन

जयपुर- 9529530051

15/07/2026

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