गुना सीमंधर जिनालय के सन्दर्भ में : नीति, न्याय और आगम-

 नीति-न्याय-आगम

*?- गुना सीमंधर जिनालय का किसी एक व्यक्ति द्वारा किसी क्षेत्र को समर्पित कर देना क्या उचित है?*

= किसी एक व्यक्ति या परिवार द्वारा निर्माण या संचालन हो रहा है तो उचित था परन्तु इस मन्दिर की कार्य कारिणी समिति है। गुना एवं अन्य स्थानों का योगदान उसके निर्माण में लगा है और उस सब का दान मन्दिर को कर दिया था फिर ऐसी स्थिति में एक व्यक्ति या परिवार अकेले ऐसा निर्णय लेने में सक्षम नहीं है ना न्यायोचित। इससे अन्य मन्दिरों और समाज में अराजकता आ सकती है।


*?- विधिवत् निर्मित मन्दिर एवं प्रतिष्ठित मूर्ति की पुनः प्रतिष्ठा कब होती है?*

=जब मन्दिर या मूर्ति क्षतिग्रस्त हो। गुना सीमंधर जिनालय एवं लगभग 50 मूर्तियां पूर्ण सुरक्षित हैं। फिर प्रशस्ति मिटाकर पुनः प्रतिष्ठा का औचित्य नहीं है। ना ऐसी परम्परा है ना आगम उल्लेख। इससे भी समाज में अराजकता उत्पन्न होगी।


*? गुना की मूर्ति किसी मुनि द्वारा सूरिमंत्रित नहीं हैं इसलिए वे पूज्यनीय नहीं हैं?*

= पंचकल्याणक विधि में प्रतिष्ठाचार्य सूरिमंत्र देने के लिए अधिकृत हैं। हां, अगर आसपास मुनिराज हों तो उनके द्वारा सूरिमंत्रित करवा सकते हैं। यह अच्छा है। परन्तु बिना मुनि के सूरिमंत्रित प्रतिमा अपूज्यनीय कदापि नहीं हो सकती है। सवस्त्र भट्टारकों द्वारा एवं प्रतिष्ठाचार्यों द्वारा सूरिमंत्रित मूर्तियां 50 साल पूर्व तक की 100% हैं और अभी तक कई मूर्तियां मुनियों के बिना सूरिमंत्रित हो रहीं हैं। आर्यिका माताजी के सानिध्य हो रहे पंच कल्याणकों में सूरिमंत्र प्रतिष्ठाचार्य ही देते हैं। इस बात का कई आचार्य, मुनि, आर्यिका, विद्वान समर्थन करते हैं। 


*? - पहले मुनि नहीं थे तब सवस्त्र भट्टारक एवं प्रतिष्ठाचार्य सूरिमंत्र देते थे लेकिन जब वर्तमान में मुनिसंघ हैं तब उनसे ही सूरिमंत्र दिलवाना चाहिए।*

= ये बात सही है कि इससे पंचकल्याणक एवं मूर्ति प्रतिष्ठा में विशेषता आती है। परन्तु उस समय आसपास मुनिसंघ उपलब्ध नहीं हों तो प्रतिष्ठाचार्य सूरिमंत्र दे सकते हैं।


*?- मुमुक्षुओं के किसी भी मूर्तियो में मुनियों द्वारा सूरिमंत्र नहीं दिलवाया गया?*

= ये बात सही नहीं है। आचार्य शान्तिसागरजी हस्तिनापुर वाले, मुनि निर्वाण सागरजी, मुनि कैलाशसागरजी आदि आचार्य एवं मुनियों ने मुमुक्षु समाज के पंचकल्याणकों में सानिध्य भी प्रदान किया है एवं सूरिमंत्र भी दिया है। केसली (सागर) पंचकल्याणक में स्वयं आचार्य विद्यासागर जी महाराज का संघ  का सानिध्य था एवं उन्होने ही सूरिमंत्र दिया। इसलिए ये कहना असत्य एवं भ्रामक है कि मुमुक्षु मन्दिरों में मुनियों ने सूरिमंत्र नहीं  दिया। 


*?- मुमुक्षु मन्दिरों की प्रतिष्ठा दिगम्बर आम्नाय के अनुसार नहीं होती है इसलिए मुमुक्षु मूर्तियां पूज्यनीय नहीं हैं?*

= सोनगढ़ के प्रथम एवं आगे की प्रतिष्ठायें दिगम्बर जैन समाज के सर्वमान्य प्रतिष्ठाचार्य पण्डित नाथुलालजी इन्दौर द्वारा हुई हैं। अन्य मुमुक्षु मन्दिरों की प्रतिष्ठायें भी उन्हीं के द्वारा प्रशिक्षित प्रतिष्ठाचार्यों द्वारा हुई हैं। जिसमेंप्रमुख प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्र. अभिनन्दन कुमारजी शास्त्री खनियांधाना हैं जिन्होंने अभी तक 100 पंचकल्याणक प्रतिष्ठा यें सम्पन्न करा चुके हैं। जो घोषित तेरापंथ आम्नाय के अनुसार होती हैं। मुमुक्षु मन्दिरों का संचालन भी तेरापंथ के अनुसार होता है।


*?- तेरापंथ तो 300-400 वर्ष पहले पण्डित बनारसी दास द्वारा घोषित एवं पण्डित टोडरमलजी द्वारा विस्तारित है। दोनों ही गृहस्थ हैं इसलिए वे मान्य नहीं हैं ना उनकी परम्परा?*

= ये सही है कि ये दोनों गृहस्थ विद्वान हैं। लेकिन इन्होने कोई नयी परम्परा नहीं बनाई है, पूर्व में चली आ रही निर्दोष वीतरागी आध्यात्मिक परम्परा को ही आगे बढ़ाया है। शिथिलाचार आदिनाथ भगवान के समय से चला आ रहा है इसलिए मूल वीतरागी रत्नत्रय मार्ग को समय पर नया नाम दिया जाता रहा है ताकि मूल मोक्षमार्ग बचा रहे। अन्य मतियों से अलग तीर्थंकर/ श्रमण मार्ग, श्वेताम्बरों से बचने के लिए दिगम्बर, भट्टारकों से बचने के लिए तेरापंथ नाम आया। मूल सिद्धान्त और मूलाचार की सुरक्षा ही मुख्य उद्देश्य सदैव रहा है। अगर यह कार्य पण्डित बनारसी दास और टोडरमलजी ने किया तो अच्छा ही है। जब मुनि नहीं थे तब गृहस्थ विद्वत् परम्परा भी प्रभावी मार्गदर्शक रही है। अभी भी मुनिसंघ हैं तब भी विद्वानों का योगदान रहता ही है। इसलिए विद्वानों द्वारा लिखित, टीका, सम्पादित, अनुवादित शास्त्र मान्य हीं हैं क्योंकि उसमें तीर्थंकरों का निर्दोष मार्ग ही बताया है। 


*?- क्या बीसपंथ आम्नाय से प्रतिष्ठित मूर्ति पूज्यनीय है?*

= प्रतिष्ठा विधि में तेरा और बीस का विशेष अन्तर नहीं है। अगर प्रतिमा प्रतिष्ठित है,  चंदन- फूल से रहित है तो पूज्यनीय है। गोम्मटेश बाहुबली में सब अपनी अपनी परम्परानुसार अभिषेक- पूजन करते ही हैं। कानजी स्वामी ने तीन वार पूरे दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्रों की वंदना की उसमें सब जगह अभिषेक और पूजन भी की। आज भी सभी मुमुक्षु करते ही हैं। लगभग सभी मुनिसंघ एवं गृहस्थ तेरा-बीस-मुमुक्षु मन्दिरों में जाते ही हैं। जो नहीं जाते हैं उनकी या उनके संघ की अलग मान्यता/आग्रह हो सकती है। अभी एक फोटो वायरल हो रहा है जिसमें आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज मुमुक्षु मन्दिर में दर्शन कर रहे हैं। 


*?- कोई मुनि मुमुक्षु मन्दिर में नहीं आते हैं तो नहीं आयें, उनकी स्वतंत्रता है आपको क्या आपत्ति है?*

= मुमुक्षु समाज के मन्दिर सबके लिए तेरापंथ के अनुसार दर्शन- पूजन के लिए खुले रहते हैं। और जब आचार्य/मुनि/आर्यिका  दर्शनार्थ आते हैं तो प्रबंध समिति उनकी विशेष व्यवस्था भी करती है‌। टोडरमल स्मारक जयपुर में मुनिसंघों की आगवानी एवं प्रवचन आदि भी किये गये। जो आमंत्रित/ निवेदन करने पर भी नहीं आना चाहते हैं उसमें कोई क्या कर सकता है। सबकी स्वतंत्रता है। लेकिन ये आग्रह कि - चाहे मन्दिर- मूर्ति आगम- परम्परा  सम्मत हों, अन्य मुनिसंघ दर्शंन करते हों लेकिन मैं नहीं जाता, ना मानता हूॅं। और फिर  शुद्धिकरण के नाम पर मन्दिर तोड़ना, मूर्ति की प्रशस्ति मिटाकर पुनः प्रतिष्ठा करवाना ये उचित नहीं है, आगम- परम्परा सम्मत नहीं है। इससे समाज में अशान्ति और अराजकता फैलेगी। और  साथ ही भविष्य में जब जिसका प्रभाव बढ़ेगा वह अपने हिसाब से परिवर्तन करता रहेगा। ये स्थाई अशान्ति और अराजकता का कारण है। आप अलग से अपनी मान्यतानुसार कितने ही मन्दिर - मूर्ति बनवायें इसमें आपत्ति नहीं है। वैदिक-बौद्ध-मुस्लिम- ईसाईयों ने  सत्ता के बल पर खूब जैन मन्दिर- मूर्तियां तोड़ी, कब्जा किये। परन्तु जैन शासकों कभी भी किसी अन्य धर्म के मन्दिर- मूर्ति को तोड़कर जैन नहीं बनाई। नये बनवाये। वैसे भी जैन सृजनकर्ता हैं विध्वंसक नहीं। लेकिन जब अपने ही अपनी विरासत- धरोहर बदलने लगे तो जैनधर्म एवं जैन समाज कैसे सुरक्षित, विकसित होगा? इस पर विचार होना चाहिए।


*?- कानजी स्वामी श्वेताम्बर थे एवं उनका मरण अस्पताल में हुआ था इसमें वे ना जैन हैं ना दिगम्बर। इसलिए उनके द्वारा निर्मित मन्दिर - मूर्ति - शास्त्र को नहीं मानते हैं।*

= ये सही है कि कानजी स्वामी मुंहपट्टी वाले स्थानकवासी श्वेताम्बर जैन बड़ी मान्यता वाले साधु थे। परन्तु उन्होंने दिगम्बर शास्त्रों को पढ़कर अपना मत परिवर्तन किया और दिगम्बर गृहस्थ घोषित किया। और आजीवन दिगम्बर जैन तेरापंथ के अनुसार सैद्धांतिक और आचारगत जीवन यापन किया। अन्य मत से जैनधर्म स्वीकार करने वाले बहुत से महापुरुष हैं इससे उन पर प्रश्नचिह्न खड़ा नहीं किया जा सकता है। प्रथम गणधर इन्द्रभूति गौतम और उनके 500 शिष्य ब्राह्मण थे। जम्बूस्वामी के साथ दीक्षित होने वाले 500 चोर किस जाति के थे? जैन स्वतंत्र जाति तो है नहीं। मूल रूप से तीर्थंकरों के वंशज जैन हैं जो क्षत्रिय थे। ब्राह्मण और वैश्य भी जैन धर्मावलंबी थे। इनके अलावा कथिक अस्पृश्य शूद्र भी पंचम गुणस्थानवर्ती क्षुल्लक दीक्षा तक लेकर अपना कल्याण  कर सकता है। इसलिए जैन धर्म में ऐसा जातिगत प्रतिबंध नहीं है। फिर कानजी स्वामी तो जैन ही थे। रही बात अस्पताल में मरण की तो आज भी जैन विद्वान और संयमी भी अस्पताल में भर्ती हुए ऐसे उदाहरण हैं। लेकिन वहां दवाईयों का भक्षण नहीं किया। कानजी स्वामी अविरत गृहस्थ थे। उनके प्रतिमायें नहीं थी फिर उनका सदाचार श्रेष्ठ था। 

*?- सोनगढ़ वाले 25 तीर्थकर मानते हैं और 25 वां तीर्थंकर कानजी स्वामी को मानते हैं जो आगम सम्मत नहीं है इसलिए समाज में उनका विरोध है।*

= सोनगढ़ वाले भी  24 ही तीर्थंकर मानते हैं। ये गलत प्रचार किया जाता है। चंपावेन के कथित जातिस्मरण ज्ञान के आधार पर कानजी स्वामी को   विदेह क्षेत्र संबंधी सूर्यकीर्ति नामक भावी तीर्थकर होना बताया जाता है। ऐसे भावी तीर्थकर सूर्यकीर्ति की मूर्तियां कुछ स्थानों पर हैं। कानजी स्वामी ने जातिस्मरण के आधार पर मूर्ति बनाने एवं इस पृरकार के प्रचार का स्पष्ट निषेध किया था इसलिए उनके जीवन काल में सूर्यकीर्ति भावी तीर्थकर की मूर्ति नहीं बनीं। परन्तु उनके जाने के बाद चंपावेन के विशेष अनुराग और आग्रह से मूर्ति प्रतिष्ठित हुईं जिसका मुमुक्षु समाज एवं अन्य जैन समाज ने पूरा विरोध किया। इस वजह से टोडरमल स्मारक जयपुर के नेतृत्व में सोनगढ़ की सूर्यकीर्ति धारा से मुमुक्षु समाज अलग हुआ और आज भी मुमुक्षु समाज में भावी तीर्थकर सूर्यकीर्ति की प्रतिमा को मान्यता नहीं है। 


*? अगर कानजी स्वामी सही थे तो उनका जैन समाज में विरोध क्यों?*

= नये का विरोध होना स्वाभाविक है। विरोध से दोनों पक्षों को लाभ होता है। इससे विश्लेषण/समीक्षा/आत्मावलोकन अच्छी तरह से हो जाता है। वाद-विवाद प्रतियोगिता में पक्ष- विपक्ष बनाये ही इसीलिए हैं। आचार्य समन्तभद्र ने परीक्षा करने को प्रमुखता दी है। चूंकि सच्चे देव-शास्त्र-गुरु के सच्चे श्रद्धान से सम्यग्दर्शन होता है तो फिर इनका क्या स्वरूप है?- इसको भी समझना अत्यन्त आवश्यक है। विरोध के तीन कारण होते हैं- गलत होना, गलत पता होना या सब पता होते हुए भी गलत तरीके से प्रस्तुत करते हुए अपनी मार्केटिंग के लिए विरोध करना।

डॉ.अरविन्द कुमार जैन

जयपुर-9529530051

17/07/2026


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