दिगम्बर जैन तेरा पंथ- दशा और दिशा


*दिगम्बर जैन तेरा पंथ दशा और दिशा*

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    दिगम्बर जैन तेरापंथ, 17वीं शताब्दी में भट्टारक प्रथा के वर्चस्व के विरोध और शुद्ध अध्यात्म के जागरण (पं. बनारसीदास, पं. टोडरमल जी आदि के प्रयासों) के फलस्वरूप उभरा एक प्रमुख सुधारवादी पन्थ है। इसका मूल उद्देश्य आगम-सम्मत वीतरागता, अध्यात्म और शुद्ध चर्या की पुनर्स्थापना रहा है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में दिगम्बर जैन तेरापंथ की दशा (वर्तमान स्थिति) एवं दिशा (भविष्य का मार्ग) का विभिन्न स्तरों पर विश्लेषणात्मक विवरण इस प्रकार है-

*1. साधु संघों में-*

*दशा-* तेरापंथ की मूल विचारधारा में निर्ग्रन्थ दिगम्बर मुनियों का सर्वोच्च स्थान है। वर्तमान में साधु संघों में भट्टारक व्यवस्था लगभग समाप्त हो चुकी है, जो तेरापंथ की एक बड़ी सैद्धांतिक विजय है। अधिकांश आधुनिक साधु संघ शुद्ध आगमानुकूल चर्या (निर्वस्त्रता, पदयात्रा, एक बार आहार) का पालन कर रहे हैं। यद्यपि कुछ साधु संघों में बीसपंथ और तेरापंथ की पूजा-पद्धतियों का मिला-जुला रूप दिखता है, किन्तु सैद्धांतिक स्तर पर वीतरागता को ही प्रश्रय दिया जाता है।

*दिशा-* भविष्य की दिशा समन्वयवादी है। साधु संघ अब पंथगत भेदों से ऊपर उठकर समग्र दिगम्बरत्व और 'श्रमण संस्कृति' के संरक्षण पर जोर दे रहे हैं, जो समाज के लिए एक सकारात्मक और एकतावादी कदम है।


*2. विद्वानों (विद्वत् वर्ग) में*-

 *दशा-* तेरापंथ का सबसे मजबूत आधार इसका विद्वत् समाज रहा है। जयपुर, विभिन्न स्मारकों और विद्यापीठों से निकले विद्वत् जनों ने स्वाध्याय, आगम संपादन और शिविरों के माध्यम से समाज में धर्म के वास्तविक मर्म को जीवित रखा है। आज का विद्वत् वर्ग आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ जैन दर्शन के गहन अध्ययन से युक्त है।

*दिशा-* दिशा अत्यधिक आशाजनक किन्तु चुनौतीपूर्ण भी है। विद्वत् वर्ग को अब केवल सैद्धांतिक चर्चाओं (निश्चय नय) तक सीमित न रहकर, युवा पीढ़ी के जीवन की व्यावहारिक समस्याओं का समाधान आगम के आलोक में प्रस्तुत करना होगा। डिजिटल माध्यमों का उपयोग इस दिशा में क्रांति ला रहा है।


*3. श्रावकों में-*

 *दशा-** वर्तमान में तेरापंथी श्रावक स्वाध्याय प्रेमी हैं और अंधभक्ति के स्थान पर तर्क और आगम-प्रमाण को महत्व देते हैं। यद्यपि भागदौड़ भरी जीवनशैली के कारण दैनिक स्वाध्याय और अभिषेक में युवा पीढ़ी की निरंतरता में कुछ कमी आई है, फिर भी तत्वज्ञान के प्रति एक सहज आकर्षण बना हुआ है।

*दिशा-* भविष्य में श्रावकों की दिशा 'क्रियाकांड' से अधिक 9'तत्व-निर्णय' की ओर जा रही है। ऑनलाइन स्वाध्याय और डिजिटल कक्षाओं ने श्रावकों को एक नई दिशा दी है, जिससे वे विश्व के किसी भी कोने में बैठकर वीतराग विज्ञान से जुड़ सकते हैं।


*4. मन्दिर / तीर्थक्षेत्रों में-*

*दशा-* तेरापंथी मन्दिरों में केवल वीतराग जिनेन्द्र भगवान् की प्रतिमाएँ विराजमान होती हैं (यक्ष-यक्षिणी, क्षेत्रपाल या पद्मावती आदि रागी-द्वेषी देवों की नहीं)। वर्तमान में कई तीर्थक्षेत्रों के प्रबंधन में बीसपंथ और तेरापंथ की मान्यताओं (विशेषकर अभिषेक को लेकर) के कारण कभी-कभी वैचारिक मतभेद या विवाद देखने को मिलते हैं।

*दिशा-* नवनिर्मित मन्दिरों और तीर्थों में वास्तुकला के साथ-साथ 'शुद्धाम्नाय' (पूर्ण वीतरागता) की स्थापना पर जोर दिया जा रहा है। दिशा स्पष्ट रूप से समन्वय और सह-अस्तित्व की है, जहाँ विवादों को दरकिनार कर तीर्थों की शुद्धि और सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है


*5. पूजा पद्धति में-*

 *दशा-* तेरापंथ की पूजा पद्धति पूर्णतः अहिंसा-प्रधान है। इसमें भगवान् का अभिषेक केवल शुद्ध प्रासुक जल से (पंचामृत से नहीं) किया जाता है। पूजा में सचित्त द्रव्यों (ताजे फल, फूल, हरी पत्तियां) का निषेध है और उनके स्थान पर अचित्त द्रव्यों (सूखा गोला, लौंग, बादाम, चावल आदि) का प्रयोग होता है

*दिशा-* यह पद्धति भविष्य में और अधिक प्रासंगिक हो रही है, क्योंकि यह पर्यावरण संरक्षण और सूक्ष्म जीव-हिंसा से बचाव के आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के भी अनुकूल है। युवा पीढ़ी को जब इस 'अहिंसक पूजा पद्धति' का वैज्ञानिक तर्क समझाया जाता है, तो वे इसे सहर्ष स्वीकार कर रहे हैं।


*6.तारण (तारणपंथ) के संदर्भ में-*

*दशा-* तारणपंथ (तारण स्वामी द्वारा स्थापित) मूर्ति पूजा का पूर्ण निषेध करता है और केवल शास्त्र (ग्रन्थ) पूजा को मानता है। तेरापंथ, यद्यपि भगवान् की मूर्ति पूजा का समर्थक है, किन्तु दोनों पंथों में 'आडम्बर का विरोध', 'भट्टारक प्रथा का निषेध' और 'शुद्धात्मा की खोज' जैसे कई वैचारिक बिंदु समान हैं।

*दिशा-* वर्तमान में दोनों संप्रदायों के बीच एक मौन वैचारिक संवाद है। यद्यपि पूजा पद्धति (मूर्ति बनाम ग्रन्थ) का भेद स्थायी है, फिर भी आध्यात्मिक चर्चाओं, कुन्दकुन्द साहित्य और तत्वज्ञान के मंच पर दोनों विचारधाराएँ एक-दूसरे के निकट आ रही हैं।

*7. मुमुक्षुओं में-*

 *दशा-* कानजी स्वामी द्वारा प्रवर्तित मुमुक्षु मण्डल मूलतः तेरापंथ की ही एक आध्यात्मिक और निश्चय-प्रधान शाखा के रूप में विकसित हुआ है। मुमुक्षुओं ने समयसार आदि ग्रन्थों और कुन्दकुन्द आचार्य की परम्परा को जन-जन तक पहुँचाने में अभूतपूर्व योगदान दिया है। इनकी मन्दिर और पूजा पद्धति पूर्णतः तेरापंथ के नियमों (शुद्ध जल अभिषेक, अष्टद्रव्य, वीतराग भगवान् की ही स्थापना) पर आधारित है।

 *दिशा-* मुमुक्षु मण्डल और पारंपरिक तेरापंथ के बीच की रेखा अब बहुत क्षीण हो गई है। भविष्य की दिशा एक एकीकृत 'अध्यात्मवादी दिगम्बर समाज' के निर्माण की है। मुमुक्षुओं का व्यवस्थित शिक्षण तंत्र और पारंपरिक तेरापंथियों की आगमिक चर्या मिलकर जैन धर्म की प्रभावना को एक नई और शक्तिशाली वैश्विक दिशा दे रहे हैं।

- डॉ.अरविन्द कुमार जैन जयपुर -9529530051

- दि.- 05/07/2026

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