23. परम गुरु - शिष्य परम्परा और वर्तमान

 परम गुरु-शिष्य परम्परा और वर्तमान

 भगवान महावीर की दिव्य ध्वनि गणधर के अभाव में 66 दिन तक नहीं खिरी। इन्द्र द्वारा प्रेरित कर लाये गये इन्द्रभूति गौतम के गणधर बनते ही ॐकारमयी देशना खिरी। प्रथम गणधर/पट्टशिष्य गौतम गणधर ने उसे अन्तर्मुहूर्त में द्वादशांगी रचना कर भव्य जीवों के लिए समझाया। 42 वर्ष तक अपने आराध्य गुरु के साथ रहकर निरन्तर भगवान की दिव्य ध्वनि के सार को समझाया। और जैसे ही महावीर भगवान का निर्वाण हुआ वे भी आत्म साधना में लग गये और उसी दिन शाम को केवलज्ञान प्राप्त किया। इसी प्रकार से  सुधर्म और जम्बूस्वामी ने उत्कृष्ट आत्म ध्यान द्वारा केवलज्ञान प्राप्त कर निर्वाण प्राप्त किया। भगवान महावीर का जीवन और उनकी गुरु- शिष्य परम्परा मोक्षमार्ग का सन्देश देती है इस प्रकार से जिसे समझना चाहिए -

1.कर्मवीर बर्धमान-  बाल्यावस्था के बर्धमान निडर और बलशाली रहे तथा समय आने पर पर उसे दिखाकर वीर, अतिवीर नाम प्राप्त किया। एक सूक्ति है "*जे कम्मे सूरा ते धम्मे सूरा"*। गृहस्थ धर्मात्मा पुरुषों को परिवार, समाज, धर्म एवं राष्ट्र की रक्षा का उत्तरदायित्व निभाना चाहिए।  हां, शारीरिक बल,  जीविकापार्जन एवं राजनीति सब नीति- न्याय परक हो। आज अहिंसा की सही समझ ना होने के कारण जैन कमजोर समझे जाते हैं इसलिए हमारे तीर्थ/ मन्दिर, साधु, धर्म पर कोई भी हमला कर देता है। हालांकि जैन कमजोर नहीं हैं  लेकिन हमारी जीवन शैली, तैयारी एवं प्रदर्शन भी होना चाहिए ताकि लगे/लगता  रहे कि ,*जैन क्षत्रिय तीर्थंकरों के वंशज* हैं वनिये (वैष्णव) नहीं। अहिंसक व्यापारी अवश्य  हैं। मन्दिर/धर्मशालाओं के आश्रित व्यायाम शालायें होना चाहिए। शौर्ययुक्त खेलों के आयोजन होना चाहिए। इस बहाने जैन नई पीढ़ी व्यसन मुक्त होगी, बलयुक्त और नैतिक होगी। आहार विहार पर नियंत्रण भी इस विधि से हो सकता है। बड़े तीर्थों/ संस्थाओं को इस दिशा में कार्य करना चाहिए। तीर्थंकर ऋषभदेव के षटकर्म की अवधारणा को व्यवहार में लाना होगा। ग्रामीण क्षेत्र में कृषि जैनों की आजीविका का प्रमुख स्रोत है।

2.धर्म एवं धर्मायतनों की मर्यादा-  तीर्थंकर जीव के प्रभाव के कारण चारण ऋद्धिधारी मुनियों को शंकाओं का समाधान मिला जिससे वे सन्मति कहलाये। तीर्थंकर जीव के गृहस्थ काल में मुनि उनके सामने नहीं आते हैं ताकि उन्हें नमस्कारादि औपचारिकता की दुविधा ना हो। इसी प्रकार चक्रवर्ती आदि शलाका पुरुष भी आमने-सामने नहीं होते हैं। सम्यक्त्व और संयम की रक्षा की द्रष्टि से यह बात महत्वपूर्ण है। श्वान, सर्प, हाथी आदि तिर्यंच पशु भी सम्यक्त्व के कारण पूज्य हुए। मनुष्य भी सम्यक्त्व और संयम के कारण देवपूजित हुए। वीतरागी-सर्वज्ञ भगवान ही पूज्य हैं, आदर्श हैं- यह श्रद्धान प्रत्येक जैन के प्राण होना चाहिए। आज दिगम्बर - श्वेताम्बर, तेरा- बीस के पंथवाद में वीतरागता तिरोहित हो रही है। रागी- द्वेषी, अस्त्र-शस्त्र-वस्त्र वालों की पूज्यता जैनों में बढ़ रही है,  चाहे स्वमत के हों या परमत के। देवी-देवताओं के द्वारा जैन धर्म/धर्मात्माओं की रक्षा की जाती रही है, अतिशय भी होते हैं - यह सब उनके वीतरागधर्म के प्रति पूर्व अनुराग/ श्रद्धान का परिणाम है, जो प्रशंसनीय है। परन्तु पूज्यता की मर्यादा तो रहेगी। संयमी जीवों द्वारा असंयमी लोगों/देवों के गुणानुवाद, महिमा मंडन,  पूजन-विधान कितना उचित है इस पर विचार किया जाना चाहिए। ये पंथवाद की बात नहीं जिनदर्शन की बात है। 

3.निर्दोष संयम परम्परा- बर्धमान का गृहस्थ काल 30 वर्ष रहा। वैराग्यमय परिणाम होने के कारण विवाह नहीं किया। आज तीर्थंकर और केवलियों का विरह है। लेकिन पंचमकाल के अन्त तक मुनि- आर्यिका- श्रावक- श्राविका- चतुर्विध संघ रहेगा। साधु/धर्मात्मा ही धर्म के आधार हैं। चलते फिरते मोक्षमार्ग हैं / धर्म हैं इसलिए श्रावक और साधु दोनों का आचार, विचार और वाणी आगम के अनुकूल ही होना चाहिए। लौकिक बांछा, पद, आपसी प्रतिद्वन्द्वता, हीनाचार, मिथ्याचार, अनर्गल प्रलाप आदि का जिनशासन के सामने कोई स्थान नहीं है। जितना पले उतना व्रत लेवें। नहीं पलता जानें तो गुरु/आगम प्रमाण प्रायश्चित लेवें। पुन: साधना युक्त हों। आदिनाथ के साथ 4 हजार राजाओं देखा देखी दीक्षा ली, सहन नहीं हुआ तो कंद -मूल आदि भक्षण करने लगे उस समय वनरक्षक क्षेत्रपाल द्वारा जो चेतावनी दी गई थी वही चेतावनी आज भी प्रासांगिक है। सम्यक्त्व-व्रत की हीनता के कारण जिनशासन दूषित हो, अपवाद बढ़े एवं हीनाचार की परम्परा बढ़े - ऐसा जघन्य अपराध नहीं करना चाहिए, ना होने देना चाहिए। मौन साधना भी तीर्थंकर का सबसे बड़ा सन्देश है। आज मौन की अपेक्षा गुरुता का आधार मुखरता बन रहा है। आगम और भाषा समिति का दायरा तो होना ही चाहिए। निर्दोष  जिन शासन की सुलक्षा एवं समाज की शान्ति के लिए  भी आवश्यक है। श्रावक एवं श्रमण की आगमानुसार द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की मर्यादा की परम आवश्यकता है।

4.केवल करणीय कार्य-   केवलज्ञान होने पर 42 वर्ष से 72 वर्ष की उम्र तक जीवन पर्यन्त 30 वर्ष केवल मोक्षमार्ग का ही उपदेश दिव्यध्वनि के माध्यम से हुआ। अपने पद के अनुरूप करने योग्य क्या कार्य यह बात यहां समझना चाहिए। मोक्षमार्ग का उपदेश ही सर्वोत्कृष्ट कार्य है जिसे साधु अपने आचरण के बल पर देवें एवं श्रावक अपने षट् आवश्यकों के पालन करके देवें। साधु को दीक्षा देना, शास्त्र लेखन और प्रवचन करणीय हैं। श्रावक धरृम श्रवण,  मन्दिर निर्माण- प्रतिष्ठा, शास्त्र प्रकाशन, साधु सेवा मुख्य कार्य हैं। पद विरुद्ध कार्य जिनागम विरुद्ध कार्य  तो है ही, लेकिन परम्परा बिगाड़ने वाला अधोगति का कारक है भी है। 

*5.सच्चे शिष्य का दायित्व -* भगवान महावीर के पट्टशिष्य गणधर आदि ने मोक्षमार्ग का ही उपदेश दिया एवं उत्कृष्ट आत्म साधना में तब तक लगे रहे जब तक केवलज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। सबके परम गुरु तीर्थंकर भगवान महावीर हैं एवं अपर गुरु गौतम गथधर। धर्म माने रत्नत्रय माने मोक्षमार्ग का उपदेश (दीक्षा, लेखन, प्रवचन) एवं आत्म कल्याण माने उत्कृष्ट आत्म साधना। जो गुरु ने किया और कहा वही शिष्य करे तभी सन्मार्ग है। श्रावक और साधु का मूल्य उनसे सम्यक्त्व, आगम ज्ञान एवं आचार से है। अभी तो अधिकांश दोनों को ही मिथ्यात्व, अनीति, अन्याय, अभक्ष्य के प्राथमिक स्तर पार करने के लिए जूझना पड़ रहा है। दीपस्तंभ प्रज्ज्वलित भी हो और सही दिशा बोधक भी है- इसकी परम आवश्यकता है।

समीक्षा-

निष्कर्षत: हमें यह विचार करना है कि क्या हमारा आचार - विचार  तीर्थंकर परम्परानुसार है? क्या हमारे कार्य/ वचन से निर्दोष वीतराग परम्परा का घात तो नहीं हो रहा है? अगर हम अपने आपको भगवान महावीर का शिष्य/ वंशज मानते हैं तो और ज्यादा विचारणीय हो जाता है। धर्म व्यक्ति होता है। इसलिए साधना भी निरपेक्षपने होगी तो ही फलदायी होगी।

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